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Hindi Short Story Main Gawahi Doonga By M.Mubin

कहानी मैं गवाही दूंगा लेखक एम. मुबीन
दरवाजे पर दस्तक देने पर दरवाजा रहमत खान ने ही खोल परंतु मुझ पर नजर पडते ही उसके चेहरे का रंग उड गया ।
‘‘आरें खोंची कुमर खान तुम ?’’
‘‘क़्यों क़्या कोई शक है ?’’ मैं उसकी आंखो में देखता मुस्कुराया ।
‘‘अरे लले की जान तुम यहां क़्यों आया यहां का हालत आजकल बहुत खराब है....’’ वह जलदी से बोल ।
‘‘क़्क़्यों खाना क़्या यही आपकगानिस्तान की शान .... और पफ़्नों की परंपरागत मेहमन नवाजी है कि हजारों मील दूर से आए मेहमन से यह पूछा जाए कि तुम यहां क़्यो आया ?’’
‘‘ओ लले की जान तुम तो हमरा जान है’’ कहते रहमत मुझसे लिपट गया ।’’ अरे तुम हमरे घर आया आपकगानिस्तान आया आम को ऐसा लगता खुदा का फारिश्ता हमरे घर मेहमन बनकर आया आम अपना आंखे तुमहारी राह में बिछाए कि दिल निकालकर तुम्‍हारे सामने रख दे आम को कुछ सुझाई नहीं देता । खान आमरे होते हुए तुम्‍हारे जिस्म पर खराश आ जाए तो आमरा जिंदगी किस काम का । बस इसी के लिए ऐसा कहता है आओ आंदर आओ कहते उसने मुझे भीतर लिया ।
उसके घर में उसकी पत्‍नी, बच्चों और सभी घर वालों ने मेरा उसी तरह स्वागत किया जिस प्रकार हर होता है ।
परंतु मैंने अनुभव किया इस बार उनकी आंखो मे मेरे आने की चमक नहीं लहारही थी । भाय की छाया पैकल रही थी ।
दो घंटे तक नहा धो कर खाना खाकर लेट कर मैंने अपनी थकान उतारी ।
‘‘खान आम जानता है काबुल से एंकधार तक का रास्तो का सपकर कितना थका देने वाल है । ऊई हम पफ़्न तो आसानी से यह सपकर तय कर सकता है । लेकिन तुम हिन्दोस्तानी को कितना तकलीपक होता होगा हम जानता है....’’ रहमत खान मेरे पैर दबाता हुआ बोल । ‘‘इस बार तुम बहुत खराव वक़्त में यहां आया है । यहां जंग कभी भी शुरू हो सकता है वई बमबारी होगा .. हर आपकगाणिस्तानी को लगता है वह आमरीका की बमबारी से नहीं बचेगा ... खान ऐसे वक़्त में आम तुम को किस तरह बचाए हमें तो फिक्र खा रहा है क़्या तुम आखबार वखबार नहीं पडता । टी.वी. नहीं देखता जो इस वक़्त यहां चल आया।’’
‘मैं जानता हूं यहां जंग कभी भी शुरू हो सकती है फिर भी मैं यहां आया’ मैंने उत्तर दिया ।
‘यह जानता था तो फिर क़्यो आया ?’
‘खान व्यापारी आदमी हूं.... जंग तो होनी है सोचा जंग शुरू होने से पहले कुछ व्यापार करके न फा कम लूं’ मैं उसकी आखों में देखता मुस्काया । ‘‘एक बार जंग शुरू हो गई तो आपकगानिस्तान से आने वाल सूखा मेवा खरीदना मुश्किल हो जाएगा इसलिए सोचा जंग से पहले जाकर खरीदारी कर लूं... यह खरीदारी... शायद बाद में लखो का लभा दे ...।’’
‘बानिया का औलद है ना मरते वक़्त भी नपेक व्योपार का ही सोचेगा’ रहमत खान हंसा ।
‘‘परंतु खान दुनिया मे जान पैसे से ज्यादा कीमती है ?’’
‘‘छोडो इन बातो को’’ मैंने कहा । ‘‘यह बताओ मेरा काम होगा ।’’
‘‘जरूर होगा ?’’ रहमत खान बोल । ‘‘इस बार तो तुम्‍हें मेवा सस्ता और बहुत सा मिल सकता है । लेग जंग के डर से सारा मल बेचने को निकाल रहा है ।’’
‘‘तो फ़्कि है ! आज आराम करते है कलसे काम पर लग जाते है,’’ मैंने कहा ।
‘‘ठीक है खान तुम आराम करो....’’ कहता रहमत खान मुझे छोडकर चल गया ।
मेरा सूखे मेवे का व्यापार था । मेरा मल आपकगानिस्तान से भी आता था रहमत खान वहां पर मेरा एजंट था । साल मे एक दो बार मैं वहां जाकर उसे पैसा दे आता वह मेरे लिए मल खरीदी करता मल इरान ले जाता और वहां से समुद्राी रास्ते भरत भेज देता ।
कभी कभी वह मल के साथ स्वयं चल आता था । वह बहुत इमनदार था । पारंपारिक पफ़्नों की इमनदारी और व फादारी उसमे रची बसी थी ।
11 सितंबर के बाद जो हालत पैदा हो गए थे यह तय हो गया था कि आमरिका आपकगानिस्तान पर आक्रमण करेगा यह युद्ध बरसों चल सकता था ।
युद्ध के बरसों चलने का आर्थ था वहां से मल नहीं आ सकता था । इसलिए मेरी व्यावसायिक मनोवॄत्ति ने सोचा क़्योंना मैं इस बार युद्ध आरंभा होने से पूर्व वहां जाकर इतना मल खरीद लऊ कि मुझे साल छ महिने फिर मल की कमी अनुभव ना हो । इसलिए लेगों के लख मना करने के बावजूद वहां चल आया ।
मेरे लिए ना तो आपकगानिस्तान नया था ना काबुल ना एंकधार । बरसों से यहां आता रहा हूं इसलिए जान पहचान वालों की कमी नहीं थी ।
मुझे विश्वास था आठा दस दिन में काम निपटाकर मैं वापस भरत चल जाऊंगा ।
काम हो जाता है तो फिर भाविय्र्य में मिलने वाले लभा का हिसाब लगाने का ही काम है ।
इन्ड़ाी विचारों में आंख लग नहीं सकी । आचानक धमकों की आवाज के कारण मैं घबराकर उठा गया । बत्ताी भी चली गई ।
घर में रहमत खान, उसकी पत्‍नी और बच्चों का शोर और चीखें गूंजने लगी तो बाहर भायानक धमके ।
‘कुमर खान कुमर खान’ अंधेरे में रास्ता टटोलता रहमत खान मेरे कमरे में आया । ‘‘उठों... जंग शुरू हो गया है आमरिका के तैयारों (हवाई जहाजों) ने हमल कर दिया है । चारों तरपक बम बरस रहा है... चले बाहर
आओ ।’’
मैं भी घबराकर बाहर आया ।
बाहर धुप आंधकार था । आकाश सियाह था जिसमें कहीं कहीं तारे चमक रहे थे तो कहीं कहीं चमकदार गोले ।
चारों ओर क़ितिज पर बमें के गिरने से धमकों और चमक लहराती थी। लेग सडकों पर दीवानों की तरह भाग रहे थे । बच्चों और स्रियों के रोने और चीखने से कान के पर्दे पकटे जा रहे थे और कभी कभी बम के धमके इन चीखों और शोर को दबा देते थे ।
एक घंटे के बाद प्रलय रूक गई ।
‘लगता है आमरीकी वापस चले गए ।’ मेरे समीप खडा रहमत खान बडबडाया । ‘‘खुदा का शुक्र है उसने हमरे घर को महफूज रखा आओ घर में चले....।’’
‘‘नहीं रहमत खान इस हमले से एंकधार में क़्या तबाही आई है मैं देखना चाहता हूं’’ मैंने कहा ।
‘‘खान तुम पागल तो नहीं हो गया ?’’ नहीं खान आमरीकी फिर वापस आएगा और फिर एंकधार पर बम बरसाएगा... रातभर बरसाता रहेगा... ऐसे में घर के बाहर रहना खतरा है ... ।
उसकी बात में मुझे सच्चाई लगी ।
सोने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था ।
बच्चों को सुलकर हम आपसमें बाते करने लगे ।
‘‘रहमत खान तुम लेग कब तक इस तरह बमबारी का सामना करते रहोगे ... तुम लेगों में उनकी मुकाबल करने का सामर्थ और शाएिक़्त तो है नहीं फिर उनकी बात मनकर तुम लेगों ने जंग टालने की कोशिश क़्यों नही की ? मैंने पूछा ।
‘‘खान क़्या तुम समझता है हम शैतान आमरीका की बात मन लेते तो जंग टल जाता.. । नही खान हम जाहिल उस शैतान को अच्‍छी तरह समझता
है । उसे अपना ताकत बताने के लिए कोई मुलक चाहिए था जहा वह अपने हाथियारों का तजरूबा कर सके ! उसे आपकगानिस्तान मिल है । 11 सितंबर को जो उसकी ताकत का गुरूर टुटा था, उसकी धोनस बनाने के लिए हम जैसे नंगे, भूखे, गरीब आपकगानियों का खून बहाना उसे जरूरी था । वह शैतान कहता है, आमरीका में जो हुआ उसाम ने किया अरे जब उसाम आमरीका में घुसकर यह सब कर रहा था तो क़्या उसका खुफिया एजन्साी सो रहा था । आगर उसाम ने यह किया भी तो उसमें तालिबान, गरीब आपकगानी आवाम का क़्या कसूर, अरे कल तुमहारा विश्व हिन्दू पारिषद का कोई सिर फिरा कोई जहाज आगवा करके राम मंदिर बनाने व्ड़ाईट हाऊस पर गिरा दे तो हिन्दूस्तान का क़्या होगा ? हिन्दूस्तान में बी.जे.पी. का हुूकमत है जो विश्व हिन्दू पारिषद का साथी है । फिर आमरिका हिन्दूस्तान पर हमल करेगा तो क़्या यह दुरूस्त होगा ?
‘‘रहमत खान यह तुमहारी मेरी नजर में ना दुरूस्त होगा’’ परंतु दुनिया की नजर में सही । दुनिया ताकत के सामने झुकती है । जिस तरह आज आमरिका के सामने झुक गई है । दुनिया के एक देश ने भी इस बात का विरोध नहीं किया कि उसाम के किए सजा आपकगानिस्तान को देना गलत है । तुमने जिस बात की मिसाल दी है यदि ऐसा कुछ हुआ तो भरत और भरतीय जनता को भी वही कुछ भाोगना पडेगा जो आपकगानी जनता भाोग रही है । बातें ज्यादा देर तक नहीं चल सकी ।
फिर आक्रमण हुआ था ।
फिर वही धमके, वही चीख व पुकार ।
रहमत खान की पत्‍नी और बच्चों की भायभीत चीखें मेरे कलेजो को फाड रही थी ।
बाहर एक शोर मचा हुआ था ।
‘‘भागो - भागो, सुरक्षित स्थानों पर छिप जाओ हमल हुआ है’’ बच्चों और महिलओंकी भाय में डूबी चीखें ।
मैंने कभी युद्ध नहीं देखा था ना कभी हवाई हमले का कोई अनुभव था। शायद उन लेगों ने भी हवाई हमल पहली बार देखा था ।
उनकी जो स्थिति थी मेरी भी वही स्थिति थी बालिक मैं तो सोचने लगा था मैंने जानबूझकर यह मुसीबत मेल ली है । हर कोई मुझे रोक रहा था । मैं वहां ना जाऊं वहां की स्थिति अच्‍छी नहीं है । युद्ध कभी भी भाडक सकता है परंतु मेरी लभा प्राप्त करने की स्वार्थी मनोवॄत्ति मुझे ना रोक सकी थी । मेरा आनुमन था मैं आठा दस दिनों में काम निपटाकर वापस आ जाऊंगा मुझे पता नहीं था । पहले दिन ही युद्ध आरंभा हो जाएंगा ।
अब मैंने केवल अपने आपको संकट में नही डाल था बालिक अपने घरवालों को भी चिंता में डाल दिया था । कल जब वे टी.वी. पर एंकधार पर हुई बमबारी के चित्र देखेंगे तो मेरे बारे में क़्या क़्या सोचेंगे ?
सारी रात हवाई हमले होते रहे ।
सवेरे चारो ओर धुंआ और धूल छाई थी ।
लेग अपने अपने घरों से निकले और रात के आक्रमण से हुए विनाश को देखने लगे ।
फिर तो यह रोज की दिनचर्या हो गई । रातभर हवाई हमले होते और कभी कभी तो दिन में भी आमरीकी विमन गरजते आते बम और मिजाईले छोड छोडकर चले जाते ।
लेग शहर छोड छोडकर भाग रहे थे ।
रात दिन आतंक के साए में भाल कोई जी सकता है । दिनरात घायल सुविधा राहित आस्पतालों में पहुचते जहा उन घायलों को देखने के लिए ना डाक़्टर थे और ना उन्‍हे देने के लिए दवांए ।
घायलों को देखकर कलेजा मुंह को आता था । छोटे छोटे चार पांच साल के बच्चे, बुढाी औरतें । रहमत खान उन दृश्यों को देख देखकर जैसे पागल सा हो गया था ।
‘‘देखो कुमर खान, यह छ साल का बच्चा तालिबान का सिपाही है, उसाम का आतंकवादी है ।’’
‘‘आमरीका ने इस आतंकवादी को कैसा सजा दिया है... यह बूढाी औरत ने 11 सितमबर के हमले में उसाम का साथ दिया था ।’’
रहमत खान की जो स्थिति थी हर सोच विचार करने वाले की यही स्थिति हो सकती थी ।
यहां आने से पहले मैंने बहुत कुछ टी.वी. पर देखा था, आखबारों में पढा था । परंतु यहां आने के बाद ऐसा कुछ भी नहीं पाया था और शायद यहां जो कुछ हो रहा है बाहर वालों को पता भी नहीं चल रहा था ।
घर में खाने का सामन खत्म हो गया था । खाने का सामन नहीं मिलता था । संयुक़्त राळ्र की एक संस्था थी जो लेगों को खाने के लिए अपने गोदामें से अनाज देती थी ।
एक दिन उस पर भी बमबारी हुई । मिजाईल गिरे और खाने पीने का सारा सामन भंग हो गया । अब खाने के लिए कुछ नहीं था । रहमत खान के बीवी, बच्चे भी भूखे थे मैं भी भूखा था । एक दिन आस्पताल पर बम गिरे और आस्पताल के सैंकडो रोगी मरे गए । बम घरों पर गिर रहे थे । घर मलबों के ढेर बन रहे थे । उन में बच्चें, औरतें, बूढे, जवान दब कर मर रहे थे ।
‘‘यह है आमरिका का दहशतगर्दी के खिलपक जंग... दुनिया को दहशतगर्दी को मिटाने के लिए उफ़्या कदम... देखो कितने दहशतगर्द मरे जा रहे है.... वह आस्पताल का सब मरीज दहशत गर्द था । दहशतगर्द को खाना नहीं मिलना चाहिए इसलिए खाने का गोदाम तबाह कर डाल । अब इन घरों की बारी है । इसमे तालेबान, उसाम का साथी रहता है ना । कुमर खान आगर तुम यहां से जिंदा बचकर निकल जाओ तो दुनिया को जरूर बताना कि आमरीका ने किस तरह दहशतगर्दी खत्म किया । अरे 11 सितमबर को जो हुआ उसका तो सारी दुनिया ने मुखालेपकत किया । फिर यह जो हो रहा है बे कसूर छोटा छोटा बच्चा, बूढा, औरत लेग मरा जा रहा है इस पर दुनिया चुप क़्यों है । यह दहशतगर्दी नहीं है तो क़्या आमन पसंदी है ?’’
‘‘रहमत कान तुम अपने आपपर काबू रखो... नहीं तो तुम पागल हो जाओगे....’’ मैं उसे समझाता तो वह हताश होकर बैठा जाता ।
एक दिन बोल ।
‘‘खान - तुम कब यहां फंसे रहोगे... यहां रहे तो किसी दिन आमरिकी बमबारी का शिकार होकर तुम भी मरे जाओगे ... तुम यहां से काबुल चले जाओ। काबुल में इंडियन सि फारतखाना (दूतावास) वाल तुम्‍हें हिन्दूस्तान भेजने का कोई ना कोई इंतजाम कर देगा । तुम सस्ता मेवा खरीदने के ललच में यहां आया मगर तुम अपनी आंख से देख चुका है हर बाग से धुआं उठा रहा है । आमरिकियोंने उन्‍हे भी अपने बमें का निशाना बनाया है । हमरे साथ रहा तो तुमहारा भी वही आंजाम हो सकता है जो हमरा होने वाल है और एक मेहमन को एक पफ़्न के घर में कुछ हो जाए तो वह पफ़्न कयामत के दिन अल्‍लाहह पाक के सामने क़्या मुंह लेकर जाएगा । इसलिए खान कयामत के दिन
रहमत खान को शार्मिंदी करने की कोशिश मत करो तुम वापस हिन्दूस्तान चले जाओ ।’’
‘‘खान । आगर मौ वापस भरत जाना चाहूं तो तुम्‍हारे बताए रास्ते से भरत वापस जा सकता हूं... मगर मैं भरत नहीं जाना चाहता । मैं अब यहीं रहूंगा। तुम्‍हारे साथ जब तक यह युद्ध चलता रहेगा... मैं यहीं रहूंगा । इस युद्ध को देखोगे तुम लेग जिस तरह आतंकवाद को मिटाने के नाम पर आतंकवाद का शिकार बन रहे हो वह देखूंगा, भाोगूंगा । मैं गवाह रहूंगा । यहां पर हुए
आतंकवाद की एक एक घटना, एक एक शण का । तुम लेगों की गवाही तो शायद नजर आंदाज कर दी जाए । शायद मेरी गवाही पर दुनिया को विश्वास आ जाए कि आतंकवाद मिटाने के नामपर कितने बडे आतंकवाद को सहारा दिया गया था...... ।’’ द द
अप्रकाशित
मौलिक
------------------------समाप्‍त--------------------------------पता
एम मुबीन
303 क्‍लासिक प्‍लाजा़, तीन बत्‍ती
भिवंडी 421 302
जि ठाणे महा
मोबाईल 09322338918

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Hindi Short Story Hindustani By M.Mubin

कहानी हिन्दूस्तानी लेखक एम मुबीन

बस से गांव मे उतरने वाल वह एक मत्र यात्री था ।
सड़क पर उसे छोडकर धूल उडाती, पकरार्टे भरती बस अपनी मंजिल की ओर बढ़ गई थी और वह अपने सामन को बटोरने में लग गया । सामन ज्यादा नहीं था वह आकेल उसे उठा सकता था । परंतु बटोरना थोडा मुश्किल काम था ।
उसकी नजर गांव की ओर उठा गई । वही हो रहा था जो अब तक होता आया है ।
दूर आने जाने वाले आगंतुक को रूककर देख रहे थे और फिर या तो आगे बढ़े जा रहे थे या वहीं रूक जा रहे थे ।
गांव थोडी दूर था । उसकी वर्दी वहां से सापक दिखाई दे रही होगी । वर्दीके कारण उसका पहचान लिया जाना कोई नई बात नहीं थी । इस गांव का वह एक मत्र जवान था जो सेना में था इससे पहले वह जब भी गांव आता था उस वर्दी के कारण दूर ही से पहचान लिया जाता था और दूर ही से गांव वाले आवाजें लगाते ओर दौड पडते थे ।
‘‘आहमद भाईजान आ गए रे... आहमद भाईजान आए है ।’’
आकर वे उसका सारा सामन अपने हाथों मे ले लेते थे । उसे कभी भी सामन अपने घरतक ले जाना नहीं पहा था । सडक से घर तक सारी बातें हो जाती थी ।
‘‘भाईजान आपकाघाव कैसा है ?’’
‘‘इसबार आप ईद पर नहीं आए ?’’
‘‘बाबू की लडकी की शादी में भी नहीं आए ।’’
‘‘हम रोज आखबारों में दुश्मन की गोलबारी के समचार पढते है, टी.वी. पर देखते है.... आपके क्षेत्र में तो शान्ति है ना ?’’
परंतु उस दिन ना तो उसे देखकर किसीने ने आवाज लगाई और ना कोई उसका सामन उठाने के लिए दौडा ।
किसी तरह सारा सामन अपने शरीर पर लदकर वह गांव की ओर बढा ।
वह बोझ उठाए गांव वालों के समीप से गुजर रहा था ।
गांव वाले मूर्तिया बने उसे देख रहे थे । परंतु ना तो कोई उसे सलामकर रहा था और ना ही कोई उसका बोझ उठाने के लिए आगे बढ़ रहा था।
मूर्ति बने उसे देख रहे थे । उनकी आखों में भाय भी था और ग्लानी भी।
उसके भाई के लडके ने शायद उसे देख लिया वह दौडता हुआ आया और उसने उसके हाथों से आधा सामन ले लिया ।
‘‘चाचा अब हमरा इस गांव मे कुछ नही रहा है । सब कुछ तबाह हो चुका है, या तो जल दिया गया है, या लूट लिया गया है’’ कहता वह दहाडे मर-मर कर रोने लगा । उसे लगा जैसे कोई बरछी उसके दिलमें मर गया और उसके सारे आस्तित्व में पीडा की लहरें दौडने लगी ।
एक आसहन पीडा उस गोली की पीडा से भी आधिक जो दो वर्ष पहले कारागिल के युद्ध में लगी थी और जिसे निकाल दिए जाने के बाद भी वह कई दिनों तक दर्द से तडपता रहा था । उस समय जब वह गांव आया था तो लेगों ने उसे पैर धरती पर रखने नहीं दिया था अपने हाथों पर उठा लिया था ।
सारे गांव को सजाया गया था । सडक पर एक बहा सा स्वागत द्वार लगा हुआ था । लउडास्पिकर पर देशभाएिक़्त के गीत बज रहे थे, चारों ओर तिरंगे झंडे लगे थे उसके स्वागत के लिए सारा गांव उमड पडा था ।
गांव की औरतों ने मिलकर उसकी आरती उतारी थी और गांव के बडे, बूढों, नेता लेगोंने उसके स्वागत में भाषण दिए थे ।
‘‘यह गांव धन्य हो गया जिसने आहमद भाईजान जैसे जवान को जन्म दिया । जिसने कारागिल के युद्ध में दुश्मनों का मुकाबल करके उन्‍हे इस गांव की मिटटी की वीरता, शुरता का एहसास दिलया । अपने शरीर पर गोली खाई पंतु दुश्मन को खदेड कर रहा । सरकारने आहमद भाईजान को युद्ध मं वीरता दिखाने पर मेडल दिया यह सारेगांव के लिए सममन की बात है । इस गांव के इतिहास में आहमद भाईजान का यह कार्य जबतक दुनिया रहेगी हमरे गांव का वह स्वार्णिम इतिहास जगमगाता रहेगा । गांव के उस वीर सपूत के स्वागत में आगर हम अपनी पलके भी बिछाए तो वह कम है ।’’
और फिर
‘‘आहमद भाईजान...... जिंदाबाद’’
‘‘भरतीय सेना जिंदाबाद’’
‘‘भरतीय जवान जिंदाबाद’’
के नारों से सारा गगन गूंज उठा था । उसे फूले से लद दिया गया था । गांववालों के उस स्वागत, सममन, प्यार, आपनत्व से उसका मन गदगद हो उठा था । उसे इतनी खुशी इस समय भी नहीं हुई थी जब सारे जवानों के सामने कमंडर साहब ने उसके सीने पर युद्ध में वीरता दिखाने के लिए मेडल लगाया था ।
उसे लग रहा था वहां तो उसे केवल एक तमगा दिया गया था । यहां तो उसे हजारों मेडल दिए जा रहे है ।
उसे युद्ध में केवल एक गोली लगी थी और उसे उसके कारण दो महीने तक आस्पताल में रहना पडा था ।
उसे मिलने वाल सममन इतना ज्यादा था कि यदि युद्ध में गोलियों से उसका सारा शरीर भी छलनी हो जाता तो भी इस मिलने वाले सममन के मुकाबले में वह कम था ।
परंतु आजकी स्थिति ने उसे झकझोर कर रख दिया ।
वही सारे चेहरे थे, वही लेग थे जो बुत बने उसे देख रहे थे ।
ना तो कोई उसे सलाम कर रहा था और ना कोई आगे बढकर उससे हाथ मिल रहा था और ना उसका हालचाल पूछ रहा था ।
हर किसी के चेहरे पर भाय था ।
पश्चाताप और ग्लानी ! किसी आपराध की मिलने वाली सजा की कल्‍पना का भाय ।
‘‘आब्बा को उन्ड़ों ने बहुत मरा चाचा.... उनका एक हाथ और एक पैर टूट गया है .. हम तो समझे थे शायद आब्बा जिंदा नहीं है... आस्पताल में दो दिन के बाद उन्ड़े होश आया । मैं आममी, दादी, दोनो बहनों को लेकर सुरक्षित स्थान पर चल गया था । हमें या किसी को कल्‍पना भी नहीं थी कि यहां भी ऐसा हो सकता है और हमरे साथ भी ऐसा हो सकता है । सारे घर वाले कहते थे । हम पचास साल से इस गांव में रहते है । सारा हिन्दूस्तान बार बार जल मगर इस गांव में कुछ नहीं हुआ ! हमें कुछ नहीं ! हुआ इस कारण तो घर वाले गांव से जाना ही नहीं चाहते थे परंतु बहुत समझाने पर वे मेरे साथ गांव छोडकर जाने तैयार हुए कि आसपास के सारे देहात जल रहे है वह आंच कभी भी यहां आ सकती है । इस बार गांव के लेगों के तेवर भी बदले बदले से है.... अच्‍छा हुआ हम गांव छोडकर चले गए वरना शायद कोई भी नहीं बचता ।’’
भातीजा बीते दिनो की कहानी सुना रहा था और क्रोधसे उसकी मुठ्ठियां फ्रिंच रही थी । घर के पास आते ही उसका दिल धक से रह गया ।
अब वहां घर कहा बचा हुआ था ।
वहां सिर्फ एक खंडर बचा हुआ था ।
खंडहर जिस पर जगह जगह जलने से कालिख पुती हुई थी ।
घर के पास पहुंचने के बाद मेहलले के लेगों ने उसे चारों ओर से घेर लिया परंतु वे दूरदूर ही खडे थे ।
किसी में भी उसके समीप आकर उससे बात करने का साहस नहीं था। रास्ते भर वह कल्‍पना करता आया था कि क़्या हुआ होगा ।
क़्योंकि भातीजे ने तार में केवल इतना लिखा था
‘‘इस बार दंगे में हमरा घर भी जल गया है आप तुरंत आईए ’’
इसके आधार पर क़्या कुछ हुआ होगा इसका आनुमन लगाना जरा मुश्किल था ।
पहले तो उसे विश्वास ही नहीं होता था कि इस बार उसके गांव में भी दंगा हुआ है और दंगाईयों ने उनके घर को भी जलया है ।
टी.वी. पर उसने खबरें देखी थी कि उनके जिले मे कई स्थानों पर सांप्रदायिक दंगे फूट पडे है ।
वहां सेना में उसके जिले का कोई आखबार नहीं आता था जिससे विस्तार से हालत का पता चल सके ।
टी.वी. पर भी दंगो के बारे में समचार संक़िप्त से ही आते थे कि स्थिति नियंत्रण में और सामन्य है छुटपुट घटनाएं हो रही है ।
परंतु भातीजे के तार से उसे एक झटका सा लगा और वह हताश हो गया ।
जो कुछ हुआ वह उसकी कल्‍पना भी नहीं कर सकता था वह बार बार तार पढता और विचालित हो उठता ।
उसे लगा अब वह एक पल भी यहां नहीं रह सकता । उसने छुटटी की आर्जाी दी उसकी छुटटी मंजूर हो गई और वह गांव की ओर चल दिया ।
रास्ते भर वह सोचता रहा क़्या हुआ होगा उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसा कुछ हुआ है ।
जिस गांव के लेगों ने कारागिल के युद्ध के बाद उसे इतना सममन दिया था उसे आखों पर बिफ़्या था वही गांव वाले उसके परिवार वालों के साथ ऐसा कर सकते है ?
‘‘नहीं नहीं वे गांव वाले उसके परिवार वालों के साथ ऐसा नहीं कर सकते ।’’
‘‘जरूर दंगाई दूसरे गांव से आए ड़ोंगे । उन्‍हों उसके घरको जलया होगा ।’’
‘‘मन लिया दंगाई गांव वाले नहीं है दूसरे गांव से आएं होगे परंतु फिर गांव वालों ने उन्‍हे क़्यों नहीं रोका ?’’
जो गांव वाले उसे इतना सममन दे सकते थे वे उसके घर की रश तो कर ही सकते थे ।
उसके जैसे जवान सारे देश की रश करते है । सरहदों पर वे जागते है, गोलियां खाते है ताकि देश देशवासी सुरक्षित रहें वे भाले रात रात भर जागते रहें परंतु देश वासी चैन की नींद सोते रहे । उनके घर और परिवार सुरक्षित रहे।
परंतु उसी सैनिक का घर परिवार सुरक्षित नहीं रह सका कितनी बडी विडमबना की बात थी ।
जले हुए घर के पास एक पुलिस का सिपाही पहरा दे रहा था ।
उसे देखकर वह उठा खडा हुआ और उसने उसे सलाम किया
‘‘सलाम आहमह भाईजान । मुझे यहां घरकी सुरक्षा के लिए नियुक़्त किया गया है । हमें खबर लगी थी कि इस गांव में भी गडबड हो रही है और आपकाघर भी निशाना बन रहा है । मगर सारी तहसील जल रही थी किस किस ओर ध्यान दिया जाता ।’’
‘इसलिए आप लोंगो ने मेरे घर को जलने दिया’ उसने क्रोधमें मुठ्ठियां भींच ली ।’’ जो जवान सारे देश की रश करता है आप लेग उस जवान के घर की रश नहीं कर सके तो आप सामन्य आदमी की जान, मल और घरों की रश क़्या कर पाएंगे....।
उसकी बात सुनकर सिपाही ने सिर झुका लिया ।
एक जले हुए कमरे के उपर चादर डालकर छाव कर ली गई थी और नीचे बिस्तर लगा था । उसके भाई उस पर लेटे थे उनके हाथ और पैरों पर पलस्तर हुआ था । उसे देखकर वह उठा बैठे और दहाडे मर मरकर रोने लगे।
‘आहमद सब कुछ खत्म हो गया, कुछ भी नहीं बचा सका, सब कुछ जल गया या लूट लिया गया और तो और तुमहारी वर्दी, बंदूक और सेना में मिले मेडलों को बाहर ले जाकर जलया गया । वे लेग इतने दानव हो गए थे कि उन्‍हे देश के सममन का सममन करने की भी सुध नही थी । उन सममनो को उन्‍हों अपने हाथों से जलया । मेरी हालत देख रहे हो... मैं मर जाता तो कितना अच्‍छा हो जाता कम से कम मुझे यह बातें तो तुम्‍हें सुनानी नहीं पडती ।’
वह भाई से लिपट गया । उसका भी मन भर आया और वह दहाडे मर मरकर रोने लगा ।
उसे लग रहा था सामने जैसे एक भीड है । आग जली हुई है और उस आग में उसकी सैनिकवर्दी जलई जा रही है । उसके मेडलों को पत्थरों से कुचल कर आग में डाल जा रहा है । वह बंदूक जिससे उसने कई दुश्मनों के सीने में गोलियां उतारी थी उसे तोडकर आग में डाल जा रहा है ।
‘‘आहमद मेरे बेटे तू आ गया’’ एक आवाज आई वह रघुकाका थे ।
भीड को चीरते रघुकाका उसके पास आए और उससे लिपटकर दहाडे मर मरकर रोने लगे ।
‘‘मेरे बेटे वह दानव बन गए थे । सारा गांव दानव बन गया था । यदि दानव नहीं बनता तो उन्‍हे ऐसा करने से जरूर रोकता । उन्‍हों हमरे गांव के पचास सालों की परंपरा की चित जलई है । मैं बूढा क़्या कर सकता था मैं उन्‍हे राकता रहा कि वे लेग पचास सालों से इस गांव में रहते है आज तक इस गांव मे ऐसा कुछ नहीं हुआ यह देश के एक सैनिक का घर है उस सैनिक का जिसका हमने अपने हाथो से सममन किया था । वह सैनिक जो हमरी सारे देश की रश करता है । उसके घर की रश करना तुमहारा दायित्व है और तुम उसका घर जल रहे हो ... मगर उन्‍हों मेरी एक ना सुनी.... एक ना सुनी...।
‘‘काका..... हम नहीं बदल सकते सादियों से साथ साथ रहते हुए भी हम हिन्दू और मुसलामन ही रहेंगे । हम भरतीय नहीं बन सकते । कारागिल जैसे किसी आवसर पर शायद कुछ देर के लिए हम इंडियन बन जाए... परंतु उसके बात फिर हिन्दु और मुसलामन बन जाते है.... ! द द
अप्रकाशित
मौलिक
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एम मुबीन
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भिवंडी 421 302
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Hindi Short Story Doosri Baad By M.Mubin

कहानी दूसरी बाढ़ लेखक एम मुबीन
बाढ का पानी उतरा तो वह सुरक्षित स्थल से निकलकर अपने घर की ओर चल दिया ।
जैसे जैसे वह आगे बढ़ता जाता था उसका कलेजा मुंह को आता था। आसपास के घरों की दीवारों पर उतर चुके पानी के चिन्‍ह इस बात की गवाही दे रहे थे कि वहां कितना पानी था और उस स्थान पर पानी के उस स्तर से वह आनुमन लगाने का प्रयत्न कर रहा था कि उसके घर में कितना पानी होगा ।
पानी का आनुमन लगाने की जरूरत भी नहीं थी । सहायता करने वालों ने उसे और उसके परिवार वालों को घर की छत के पतरे और कौवलू तोडकर बाहर निकाल था यानि उस समय तक घर के दरवाजे से उपर तक पानी था यह तो उसकी आंखो देखी बात थी ।
वहां से निकलकर सुरक्षित शरणस्थल पर आने के बाद वहां क़्या क़्या घटा और घर पर क़्या बीती वह इस बात का केवल आनुमन लगा सकता था ।
हर कोई वापस आकर अपने अपने घर की स फाई में लगा हुआ था ।
विचित्र सा दृश्य था ।
लेग बाढ के पानी से खराब हुई चीजें बाहर पेंकक रहे थे सडकों पर खराब हुई चीजों का ढेर लगे हुए थे ।
उन खराब चीजों में क़्या नहीं था ? बाढ पीडित लेगों की सारी जिंदगी उन खराब चीजों में समाई हुई थी । बिस्तर, ताकिये, गुदाडियां, चादरें, गादी, ताकिए भीगकर इतने खराब हो गए थे कि सूखने के बाद भी उपयोग के योग्य नहीं बन सकते थे ।
अनाज, दालों, मसालों में बाढ़ का गंदा पानी भर गया था और वे खाने के योग्य नहीं रही थी । घरों के बाहर उनके भी ढेर लगे थे ।
कुछ लेगों ने कडी मेहनत का एक एक पैसा जमकरके पूरे साल का अनाज, गेहूं चावल, शक़्कर इत्यादी जम कर रखा था । शहर में पता नहीं किस चीज के दाम कब आसमन पर पहुंच जाए इसलिए सुरक्षात्‍मक कदम के तौर पर कुछ लेग जब ये चीजें कुछ सस्‍ती होती है अपने छोटे छोटे घरों में सालभर का स्टाक जमकर लेते है ।
परंतु बाढ के पानी ने उन्‍हे किसी योग्य नहीं रखा था और उन चीजों का ढेर घरों के बाहर लगा था जिससे एक सिर फाड देने वाली दुर्गंध उठा रही थी जो पूरे क्षेत्र पर छाई हुई थी ।
स्‍कूल जाने वाले बच्चों की पुस्‍तकें, कापियां, बस्ते बाढ़ के पानी में भीगकर किसी योग्य नहीं रही थी । कुछ बच्चे उन कापियों, पुस्तक को धूप में सुखाकर उपयोग योग्य बनाने का असफल प्रयत्न कर रहे थे तो कुछ उनके खराब हो जाने पर रो रहे थे । जैसे जैसे वह आगे बढ रहा था आसपास के दृश्य देखकर उसकी आखों के सामने आंधकार छा रहा था और उन दृश्यों के प्रकाश में अपने घर की कल्‍पना करके उसका दिल बैठा जा रहा था ।
आंत वह अपने घर पहुंच गया ।
बाहर ही उसे वह दृश्य दिखाई दिया जिसकी कल्‍पना उसने पहले से कर रखी थी और जिस दृश्य को देखने के लिए उसने स्वयं को तैयार कर रखा था ! उसका घर कहा बाकी बचा हुआ था । घर का केवल एक ढांचा बचा हुआ था।
पूरी चाल की स्थिती एक सी थी ।
छतें गायब थीं । दरवाजे, खिडकियां टूटे हुए थे, या टूटकर भीतर बाहर गिरे हुए थे । छोटे से आंगन में एक एक फिट तक कींचड था । कींचड में चलता टूटे दरवाजे को एक और ढकेलकर वह अपने 10 न् 12 के घर में दाखिल हुआ। वहां कुछ भी तो नहीं बचा था और जो कुछ बचा भी हुआ था तो वह किसी योग्य नहीं था ।
कोने का पलांग पानी के जोर से बहकर कमरे के बीचो-बीच आ गया था और उस पलांग पर के बिस्तर भीगकर सह रहे थे । उनसे सिर फाड देने वाली दुर्गंध उठा रही थी ।
भीतर घुटनों तक गंदा कीचड था जिसकी दुर्गंध सिर फाडे जा रही थी।
एक आशा से वह चलता वह उस कोने में आया जहा उसने अपने परिवार के लिए साल भर का अनाज चावल और गेहूं ले रखा था । दोनो थैले उसी कोने में थे ! जैसे ही उन्‍हे उसने खोल दुर्गंध का एक भा फा उसका दिमग फाड गया ।
बाढ के गंदे पानी में भीगने के बाद वह अनाज किसी योग्य नहीं था । घर में वजनी सामन बचा हुआ था हलका और छोटा छोटा सामन बाढ के साथ बहकर पता नहीं कहा चल गया होगा ।
छत के उपर से पानी गया था, जो छत के पतरों को बहा ले गया था तो भाल उन छोटे छोटे सामन की क़्या बिसात थी जो वह बाढ के पानी के जोर के सामने टिक सकता था । चाल की दीवारें मजबूत थीं इसलिए घर का ढांचा बचा रहा, वरना आगर दिवारें मजबूत नहीं होतीं तो वे भी ढह जाती और कुछ भी बच नहीं पाता ।
उसने लोहे के पलांग पर भीगी गादी को एक और थोडा सा सरकाया और पलांग पर सिर पकडकर बैठा गया ।
वह पागलों की तरह अपने छोटे से ध्वंस संसार को देख रहा था ।
दस बारह वर्ष में कितने कष्‍टों से एक एक चीज उसने जमा की थी और कुछ घंटो की बाढ उन सबको बहा ले गई थी ।
दस बारह वर्षो से वह वहां रह रहा था ।
इन दस बारह वर्षों में वहां कभी बाढ नहीं आई थी । हर साल में दो-तीन बार पानी जरूर उसके घर में घुस आता था और कभी कभी उसके और उसके परिवार वालों को कमर तक के पानी में दिन या रात गुजारनी पडती थी।
मामला बस यहीं तक सीमित रहता था ।
परंतु इस बार किसी ने आनुमन भी नहीं लगाया होगा कि सामन्यता कमर तक रहनेवाल पानी इस बार छत के उपर से चल जाएगा और छतों तक को बहा ले जाएगा तो भाल उसके आगे घर का सामन किस तरह सुरक्षित रहेगा।
उसने बचपन में इस तरह की बाढ अपने गांव में देखी थी कुछ जिस में उनके घर खेत सब बह जाते थे । वह उनके लिए सामन्य बात थी । जब वह वहां रहने आया था तो उसे उस बात से संतोष मिल था कि इस शहर में गंगाजी सी कोई नदी नहीं है । केवल एक खाडी है ।
खाडी में ज्वारभाटा के समय पानी का स्तर बढता है तो खाडी एक नदी सी प्रतीत होती है और जब पानी उपर जाता है तो कोई नाला सा लगती है ।
खाडी किनारे उसने एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया और अपने छोटे से परिवार के साथ जीवन आरंभा किया । अच्‍छा काम था, अच्‍छी आमदनी थी इसलिए खाली कमरा धीरे धीरे जीवन आवश्यक चीजों से भरने लगा । वर्ष बीतने के बाद परिवार के सदस्य भी बढने लगे । अब वे छ सदस्यों का परिवार था । पातिपत्‍नी और चार बच्चे दो लडके, दो लडाकियां ।
घर के समीप खाडी पर एक पुल था जो उस क्षेत्र को शहर से जोडता था । वह क्षेत्र एक अच्‍छा खासा शहर बन गया था ।
सब कुछ ठीक था केवल वर्षा के दिनों में थोडा सा कय्र्ट होता था ।
वर्षा इतनी होती थी कि वह अपने गांव में ऐसी तूफानी वर्षा की कल्‍पना भी नहीं कर सकता था । दो तीन दिन निरंतर होने वाली वर्षा से खाडी के जल का स्तर बढ जाता था और फिर ज्वार भाटा की स्थिति में समुद्र का पानी भी खाडी में घुस आता था । जिससे जल स्तर और आधिक बढकर उनके घर में पानी घुस आता था और जब तक ज्वार भाटा की स्थिति सामन्य ना हो उनके घर में कमर तक पानी रहता था ।
वे अपने परिवार वालों के साथ अपनी उंची सी पलांग पर आराम से बैठा रहता और घर में पानी भारा रहता था ।
फिर धीरे धीरे पानी, उतरने लगता तो वह पत्‍नी और बच्चे घर की सफाई में लग जाते ।
परंतु उस बार स्थिति विपारित थी ।
आठा दिन से वर्षा का तार नहीं टूट रहा था । खाडी का जलस्तर बढता ही जा रहा था । ज्वार की स्थिति में पानी का घर तक पहुंच जाता था । भाटा कि स्थिति में भी स्तर पर कोई अंतर नहीं पडता था ।
पूरे क्षेत्र में तुफानी वर्षा हो रही थी । समीप की नदी पर बंधा बांध भर गया था और उसका पानी छूट गया था जिसके कारण जलस्तर आचानक बढ गया ।
सामन्य स्थिति में कमर तक रहनेवाल पानी कांधे तक पहुंच गया । इस स्थिति से घबराकर उसके परिवारवालों ने सुरक्षा के लिए भीतर बनाए मचान पर शरण लिया । जब मचान तक भी पानी पहुंच गया तो वह घबरा उठा । पानी दरवाजे के उपर पहुंच गया था । दरवाजे से बाहर निकलने का तो अब सवाल ही नहीं उठता था । यदि इसी तरह पानी बढता रहा तो उस कमरे में ही, पानी मे उसकी और उसके घर वालों की कब्रे बन जाएंगी । जान बचाना हो तो तुरंत यहां से भाग जाना चाहिए । परंतु बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था । एक ही रास्ता था छत के पतरे तोडकर छत पर पहुंच जाया जाए शायद कोई मदद आ जाए । सबने मिलकर छत का एक पत्रा तोडकर इतनी बडी जगह बना ली कि छतपर पहुंचा जाए और वे उस छेद से छत पर पहुंच गए ! बाहर विचित्र दृश्य था ।
हर कोई अपने परिवार के साथ छत पर बैठा सहायता के लिए चीख रहा था ।
चारों ओर पानी ही पानी था । पूरा क्षेत्र पानी मे डूबा था । शहर को मिलने वाल पुल तो कभी का पानी में डूब चुका था । शहर से संपर्क टूट गया था ।
वर्षा निरंतर हो रही थी ।
स्वयंसेवी संस्थाएं और स्वयंसेवक रास्सियों और टायरों की सहायता से पानी में फंसे लेगों को निकालकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का पुण्यमय कार्य कर रहे थे ।
‘‘इस तरह कितने लेगों को आप लेग बचा पाएंगे ।’’
‘‘सहायता के लिए बोट क़्यों नहीं मंगा रहे है ’’
‘‘वर्षा के कारण सारे टेलिपकोन बंद हो चुके है । एक - दो जो चालु है उनसे सरकारी आधिकारियों से निरंतर संपर्क बनाकर यहां की स्थिति से आवगत कराकर उनसे सहायता मंगी जा रही है । परंतु दूसरी ओर से कभी रूखा व्यवहांर, कभी झूठी तसल्‍ली और कभी गालियां मिल रही है । एम. एल. ए. साहब से संपर्क किया गया तो उन्‍हों आश्वासन दिया कि वे बोट भेज रहे है। फिर पता चल कि बचाव काश्तियां जिलहे से आ रही है, निकल चुकी है, रास्ते में ट्रेफिक में फंसी है । आपके क्षेत्र में सहायता के लिए निकल गई है परंतु अभी तक कोई बोट नहीं आई । यदि उन पर भारोसा करके बैठे तो पानी में फंसे हजारो लेगो के जीवन संकट में पड जाएंगे । इसलिए अपनी तौर पर लेगो के प्राण बचाकर उन्‍हे सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का प्रयत्न कर रहे है ।’’
खुदा खुदा करके उसे और उसके परिवार वालों को टायरों के द्वारा सुरक्षित स्थानोंपर पहुंचा दिया गया ।
शरणस्थल पर उसकी तरह हजारों लेग और परिवार थे जो बाढ के कारण बेघर हुए थे ।
लेग भूखे और प्यासे थे । बच्चे भूख और प्यास से बिलक रहे थे ।
‘हमें भूख लगी है । हमें खाने को रोटी दो ।’
‘हम दो दिन से भूखे है ।’
बच्चे रोने पीटने लगे तो कुछ स्वयं सेवको को होश आया वह वडापाव ले आए और उन बेघरों को बाटने लगे ।
परंतु वडापाव से भाल क़्या किसी की भूख मिट सकती थी । तब यह तय किया गया की उनके भोजन का प्रबंध किया जाए । कुछ उदार दिल वालों ने अपने जिम्‍मे कुछ लेगों का भोजन ले लिया । शेष के लिए चंदा करने का तय किया गया । कुछ लेग उदार दिल से चंदा देते तो कुछ बहाने बना देते ।
‘‘क़्यां करे आप तो जानते है कितनी मंदी है और उपर से यह बाढ हमरा तो सबुकछ भंग हो गया है ।’’
दो दिन शरणार्थी शिबिर में गुजरे । कभी क्राने के लिए मिल जाता कभी आधा पेट मिलता ।
अपने घर संसार और उस का क़्या हुआ होगा सोच सोचकर ही आंखों में आसूं आ जाते थे ।
स्थानिक नेता और स्वयंसेवक आकर सांत्वना देते
‘‘आप लोग धीरज रखिए आपका जो भी नुकसान हुआ है हम सरकार से दिलने का प्रयत्न करेंगे ।’’
उनकी आंखो से आशा बंधती परंतु यह सोचकर आखों के सामने अंधेरी छा जाता कि अभी तक तो कोई भी बडा नेता, मंत्री या सरकारी आधिकारी उनकी स्थिति देखने नहीं आया है फिर भाल उन्‍हे सरकारी सहायता किस तरह मिल सकती है ?
अंत जब बाढ का पानी उतरा तो वह अपने घर आया और वह अपनी आखों से अपने ध्वसं संसार, जीवन भर की कमई की बर्बादी देखने लगा ।
आचानक एक शोर को सुनकर वह चौका । बाहर आकर देखा तो एक कैमरा टीम थी जो बाढ से शतिग्रस्त मकानों के चित्र ले रही थी । उनके पीछे तमशाई थे । वे उसके घर भी आए ।
‘ओह सब कुछ बर्बाद हो गया’ मुख्य कैमरा मेन ने कहा और वह घर की हर कोने से फिल्‍म उतारने लगा ।
‘यह आपका घर है ?’ उसने पूछा ।
‘हा’ वह बोल ।
‘आप यहां खडे हो जाइए आपकी भी फिल्‍म उतारता हूं ’ कैमरामेन बोल । ‘‘इस तरह नहीं इस तरह हा चेहरे पर दु:ख के भाव होना चाहिए जिससे पता चले कि सबुकछ बर्बाद हो जाने पर आप कितने दु:खी है . ओफ.. आपके चेहरे से यह पता ही नहीं चल रहा है कि इस नुकसान से आपको दु:ख हुआ है। जरा चेहरे को दु:खी बनाईए ।’’
वह उसे निर्देश देने लगा तो उसे क्रोधआ गया। वह बाढ की तबाही की फिलम उतारने आया है या किसी फिलम की शूटिंग कर रहा है । जो निर्देशक की तरह निर्देश दे रहा है ।
‘हा, अब आप कहिए मेरा सारा संसार तबाह हो गया । अब तक कोई भी सियासी नेता, सरकारी आफिसर हमरा हाल पूछने नहीं आया, ना हमें कोई मदद आई । हम दो दिन से भूखे है !’ कैमरामौन उससे बोल ।
‘जब हम जीवन और मॄत्यु का संघर्ष कर रहे थे उस समय नेता और सरकारी आधिकारी अपने बंगलों में चैन की नींद सो रहे थे । हमरी सहायता के लिए लाईफ बोटे तक नहीं भेजी गई । झूठी तसल्‍ली दी जाती रही कि मदद भेजी जा रही है । आगर हम उनकी सहायता के भारोसे रहते तो यह जो हमारी जिंदगी भर ती कमई बहकर गई है ना, उसके साथ हम भी बहकर चले जाते’ वह पकट पडा ।
‘वाह क़्या आंदाज है’ कैमरा मन उछल पडा । ‘‘यही आंदाज तो चाहिए था । यह पूरी फिल्‍म टी.वी. पर लगाउंगा आज सात बजे की न्यूज देखना ना भूलना ।’’
‘‘साहब यहां जीने के लाले पडे है, जीवन बचाने का संघर्ष चल रहा है तो भाल टी.वी. कहा से देख सकते है ।’’
टी.वी. कैमरा टीम दूसरे घर के चित्र लेने लगी उसके पीछे दूसरी भीड आ रही थी ।
‘देखा सत्तारूढ पक्ष का रवैया’ एक नेता जो विपक्षी दल का नेता लग रहा था चीख रहा था ‘‘आप लेगों ने उन्‍हे अपने किमती वोट देकर बहुमत से विजयी किया था । देखा उनका रवैया । आप बर्बाद हो गए है, परंतु उनके पास आपकी खबर लेने का समय नहीं है । मानवता के नाम पर वे आपका हाल पूछने भी नहीं आए तो आपकी सहायता करना तो दूर उन्‍हे भ्रळाचार करके अपने लिए रूपये उगाने, लूटने से फुर्रसत मिले तो वे आपके पास आएंगे । यह हमरी पार्टी है जिसका हर सदस्य, हर वर्कर हर बाढ पीडित के पास पहुंचा है और उसने सहानुभूति के दो बोल बोलकर ही सही आपका दर्द बांटने की कोशिश की है ।’
उसके बाद कुछ आखबार वाले और स्वयंसेवी संस्था से संबंधित लोग आए और वे नुकसान की जानकारी मंगने लगे ।
वह बताने लगा कि उसका क़्या क़्या नुकसान हुआ है और बाढ में उसका क़्या क़्या बह गया है ।
‘‘तो तुम्‍हारे घर में टी.वी. और टेप भी था ।’’
‘‘क़्यों आपको शक है । आजकल तो यह सामन्य सी चीजे है ।’’
‘‘नहीं नहीं मैंने यूंही पूछ लिया’’ कहते वह कुछ लिखने का प्रयत्न करने लगा ।
‘‘आप यहां खडे हो जाईए मैं आपकाऔर आपके घरका एक फोटो लेना चाहता हूं’’ कहते एक फोटोग्रापकर ने उसे एक जगह खडा होने के लिए कहा ।
फिर वह उसे इस तरह आलग आलग आंदाज में खडा करके आलग आलग कोनों से देखने लगा जैसे वह किसी फोटो स्टूडियों मे उसका फोटो खेंच रहा हो ।
‘‘नहीं खिंचवाना है मुझे फोटो’’ वह चीख उठा । ‘‘आप मेरे तबाह घर का फोटो ले रहे है या मुझे कोई मडल समझकर मेरे फोटो उतारने की कोशिश कर रहे है ।’’
‘‘क़्या गजब करतो हो करमू’’ एक पडोसी बोल । उन्‍हे फोटो खेंचने दो यह फोटो तुम्‍हारे नुकसान का सबूत होगा । जो तुम्‍हें सरकारी सहायता दिलने में काम आएगा ।
‘‘जीते जी तो सरकार हमे कोई सहायता नहीं दे सकती । हा आगर मर जाते तो जरूर देती । दुनिया का दस्तुर है आधमरों को कोई सहायता नहीं देता, कोई नहीं पूछता, हा मरनेवालों की लश पर आंसू बहाकर हमदर्दी जताने सब पहुंच जाते है ।’’
उस की बात सही सिद्ध हो गई । कोई सरकारी आफिसर आया था और वह चीख रहा था ।
‘‘क़्या नुकसान नुकसान लगा रखा है । यह बताओ क़्या कोई मरा भी है?’’ खाडी के किनारे घर बनाओगे तो यही सब होगा । सरकार खाडी से 70 मीटर लगकर हुए किसी भी नुकसान की कोई जिममेदार नहीं है ।
उसका तो मन चाहा जाकर उस सराकारी कारिन्दो का मुंह नोच ले ।
‘‘तो तुम क़्या समझते हो हमें मर जाना चाहिए था । हम जिंदा बच गए इसलिए यह कोई नुकसान नहीं हुआ । 70 मीटर तक सरकार की कोई जिममेदारी नहीं । अंधे होगे तभी तो दिखाई नहीं दे रहा है यह क्षेत्र खाडी से 150 मीटर से भी आधिक दूर है.....’’
‘‘खाडी को पारकर उसकी जमीन पर अनुचित मकान बना रहे हो तो पानी के बहाव के लिए जगह कहा से रहेगी । इसके कारण हो यही सब होगा’’ वह सरकारी कारिन्दा चीख रहा था ।
‘‘खाडी की जमीन पर अनुचित मकान बन रहे है । यह तुम्‍हें मलूम है परंतु तुम उसके विरूद्ध कार्यवाही नहीं करते क़्योंकि इसके बदले में पहले ही तुम लेगों की जेबें भर जाती है ।’’ वह जोर से चीखा ।
‘‘हा हा खाडी पर बनने वाले अनुचित मकानों की बात करते हो जब वे बन रहे होते है तो क़्यों नही तोडते, तुम्‍हें तुमहारा हिस्सा मिल जाता है इसलिए ना’’ सब चीख उठे । सरकारी आदमी के चेहरे पर हवाईयां उडने लगीं ।
‘‘हम पर झूठे आरोप लगाते हो देख लूंगा । एक एक को देखता हूं यहां किस तरह कोई सरकारी मदद आ पाती है । ऐसी रिपोर्ट लिखूंगा कि सरकार यह पूरा क्षेत्र अनुचित इमरते घोषित करके तोड देगी’’ वह दहाडा ।
‘‘तब तक हम तुझे जिंदा ही नहीं रखेंगे’’ कहती भीड उसे मरने के लिए दौडी तो वह सिर पर पैर रखकर भागा ।
थोडी देर बाद सत्ताधारी पक्ष के कार्यकर्ता आकर लेक़्चर झाडने लगी। ‘‘आप लेगों का जो नुकसान हुआ है उस का विवरण हम सरकार को देकर आपको सहायता दिलने का पूरा प्रयत्न करेंगे ।’’
‘‘ऐसा है तो फिर आपके मुख्यमंत्री हमरे क्षेत्रमें क़्यों नहीं आए । औपचारिकता निभाने आए और चले गए ।’’ किसी ने कहा तो वे चुपचाप हो गए।
एक टोली जाती तो दूसरी टोली आ जाती थी ।
झूठी सांत्वना देते, वादे करते, घावों को कुरदते, वास्ताविकता जो आलग ही थी । उसे लगा पहेली बाढ तो उसके जीवनभर की कमई, घर संसार बहा ले गई थी ।
परंतु यह झूठी सहानुभूति, सांत्वना, वादों की दूसरी बाढ
उसका आत्‍मसम्‍मान बहाकर ले जाएगी और इसके मन, मस्तिष्‍क को आहत कर देगी ।...........
अप्रकाशित
मौलिक
------------------------समाप्‍त--------------------------------पता
एम मुबीन
303 क्‍लासिक प्‍लाजा़, तीन बत्‍ती
भिवंडी 421 302
जि ठाणे महा
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Hindi Short Story Dharti By M.Mubin

कहानी धरती लेखक एम. मुबीन


नींद दलबीर की आखों से कोसों दूर थी ।
सोने का समय नहीं था । जिस क्षेत्र मे वह तैनात था उस क्षेत्र से घुसपैटियों और पाकिस्तानी सिपाहियों का सफाया हो चुका था । उनकी बटालियन ने बडी शान से उस चोटी पर तिरंगा लहराया था जिस पर अब तक घुसपैठी, पाकिस्तानी आतंकवादियों का कब्जा था ।
कई दिनों के निरंतर युद्ध से सारे सैनिक थके हुए थे । इसलिए यह तय किया गया था कि कुछ सैनिक पहरा देंगे, शेष आराम करके अपनी इतने दिनों की थकन उतारेंगे ।
इसी आदेश के आनुसार वह अपने खेमे में आकर लेटा था । परंतु फिर भी उसे नींद नहीं आ रही था । नींद न आने के दो कारण थे ।
शायद उनकी इसी मीठी नींद के कारण कब घुसपैठी भरतमता की धरती में घुस आए उन्‍हे पता ही नहीं चल सका और उन्‍हे खदेडने के लिए यह युद्ध छेडना पडा था ।
और दूसरा कारण था सईदखान की लश ।
शाम को वह एक बार फिर अपनी आखों से सईदकी लश देशकर आया था ।
एक बार फिर वह लश सीम से वापस आई थी । पाकिस्तानियों ने उसे अपना सैनिक मनने से इन्कार कर दिया था और उसकी लश भी स्वाीकार नहीं की थी । सईद की लश बर्फ में दबाकर रखी गई थी उसे हर प्रकार से सुरक्षित रखने की कोशिश की जा रही थी वरना आठा दिनों तक किसी लश का सुरक्षित रहना आसंभाव था ।
अब तक तो वह सड गल जाती ।
परंतु काफिन में रखी लश की देखभाल किसी बीमर की तरह की जा रही थी ।
रोजाना उसकी जांच की जाती उसको सुरक्षित रखनेवाले द्रव्य बदले जाते ।
लश की देखभाल करने वाले हर रोज इस आस पर रहते, कि शायद पाकिस्तान की ओर से सईद को अपना सैनिक स्वाीकार करके उसकी लश मंग ली जाए और वह लश उस के गांव जो क़्वेटा के पास था भेज दी जाएं जहा उसका आन्तिम संस्कार हो ।
परंतु ऐसा कुछ नहीं होता था ।
दलबीर स्वयं दिन में कई कई बार जाकर सईद की लश देखता था और कभी कभी तो उसकी लश के पास जाकर घंटो बैठा रहता था ।
आखिर इस युद्ध में सईद उसी के हाथों मरा गया था । सईद उस का दोस्त था । उसने अपने हाथों से अपने दोस्त को मरा था । उसे इस बात का कोई दु:ख नहीं था ।
क़्योंकि उसने अपनी धरती, अपने देश की रश के लिए ऐसा किया था। दोनों दोस्त थे परंतु दो दुश्मन राय्र्ट्रों के सिपाही थे । उन्‍हे एक दूसरे से लहना था । उसे आवसर मिल गया उसने सईद को गोली मर दी और वह मर गया ।
गोली चलते समय उसके मन में यह भावना नहीं थी कि सईद उसका दोस्त है और वह अपने दोस्त की जान ले रहा है ।
उसे तो अपना कर्त्तव्य पूरा करना था । अपने देश अपनी मतॄभूमि की रश करना था । जो नापाक कदम उसकी मतॄभूमि पर पडे थे उन्‍हे खदेडना था और उसने सईद को गोली मर दी ।
यदि वह सईद को गोली नहीं मरता तो सईद उसे गोली मर देता उस पर गोली चलते सईद बिलकुल नहीं झिझकता जिस तरह वह नहीं झिझका था।
क़्यों की सईद की नजर में उस समय वह उसका मित्र नहीं दुश्मन का सैनिक था जो उसके ध्येय के बीच दीवार बना हुआ था और शायद सईद को यही आदेश था कि ध्येय के बीच दीवार बनने वाली हर हस्‍ती को मिटा दो और वह इस आज्ञा का पालन कर रहा था ।
उसे केवल आज्ञा का पालन करना था । वह आज्ञा गलत है या सही उसे इससे कुछ लेना देना नहीं था । गलत या सही तय करने वाले राजनेता होता है । राजनेताओंने यदि कोई गलत आदेश भी दिया तो वह सही होता है वह चाहकर भी उसका विरोध नहीं कर सकते और यदि इस गलत आज्ञा का पालन करने में उनकी जान भी जाए तो दुनिया की नजर में चाहे वह गलत हो परंतु वे राजनेता तो उसे शहादत का दर्जा करार देकर उसका ढिंढोरा पीटते है शायद उनकी जान की कीमत यही है ।
वे राजनेता इस गलत ध्येय के पीछे अब तक लखों लेगों को मरवा चुके है परंतु उन पिशाचों की प्यास अब भी नहीं बुझ पाई है ।
शिखर पर कब्जा करने के बाद मरनेवालों की लशे जम की गई । शेष तो घुसपैठी, आतंकवादी थे, परंतु चार पांच पाकिस्तानी सैनिक थे । उनके पास से इस बात के प्रमण बरामद हुए थे और सईद खान को तो वह पहचान ही गया था । इस युद्ध में मरने वाले लगों में पांच पाकिस्तानी सैनिक है यह खबर उपर भेज दी गई ।
राजनैतिक स्तर पर इस समचार का प्रचार किया गया ‘‘मरने वाले पांच पाकिस्तानी सैनिकों की लशे इस बात का प्रमण है कि घुसपैटियों की आड में स्वयं पाकिस्तानी सेना इस क्षेत्र में सा#िकय है । यह एक खुले युद्ध की
धमकी है ।’’
इस राजनैतिक बयान के बाद उपर से आदेश आया कि पाकिस्तानी सैनिकों की लशें पाक सेना के हवाले कर दी जाए ।
आदेश आनुसार सीम पर पाक सेना को उनके सैनिकों की लशें देने ले गई ।
लशें ले जाने वालों में दलबीर भी शामिल था । लशों को देखकर उनके गिर्द एक भीड लग गई ।
अरे ‘‘इकबाल’’
‘‘सईद खान’’
‘‘नाजिम’’
‘‘हसरत आली’’
‘‘जमील’’
सैनिकों के मुंह से आवाजें निकली ।
परंतु उन लशो के बारें मे शायद उपर से आदेश आ गया था । आदेश आनुसार कहा गया
‘‘यह हमरे सैनिकों की लशें नहीं है ।’’
इस बात पर पाक सैनिकों ने अपने आधिकारियों को घेर लिया था ।
‘‘सर, यह आप क़्या कर रहें है । बरसों से हमरे साथ है और आप कह रहे है यह हमरे सैनिकों की लशे नही है । आप अपने सैनिकों की लशें लेने से इन्कार कर रहे है ।’’
‘‘मुझे उपर से जो आदेश मिल है मैं उस आदेश का पालन कर रहा हूं ’’ आधिकारी ने उत्तर दिया ।
‘‘यह कैसा आदेश है, देश के लिए शहीद होने वाले शहीदों की लशे ना ली जाएं । उन शहीदों की लशें यह कहकर दुश्मन के हवाले कर दी जाए कि मरने वाले हमरे सैनिक नहीं है । जनाब, मरने वाले सैनिकों का सममन होता है । उनकी लशें इस तरह दुश्मनों को लौटा कर उन लशों की बे हुरमती (अपमान) नहीं किया जाता ।’’
‘‘सैनिक का काम है बालिदान देना और वे सैनिक बालिदान दे चुके है। अब यह उनके बालिदान का एक और प्रकार है कि उनकी लशें वापस नहीं ली जाए उनकी लशें वापस लेने का मतलब होगा इस बातका पक़्का प्रमण देना कि पाकिस्तानी सेना घुसपैठा में शामिल है और इस प्रमण के बाद सारी दुनिया में पाकिस्तान की थूं थूं होगी इसलिए भालई इसी में है कि हम अपने सैनिकों का लशें ना लों । उन्‍हे वापस कर दे ं ।’’
‘लेकिन सरजी हमें ऐसा काम करने के लिए बाध्य क़्यों किया जा रहा है जिसका पता चल जाने के बाद सारी दुनियां में हमरी थूं थूं हो ।’
‘यह सोचना हमरा तुमहारा काम नहीं है । राजनेताओं का काम है । हमरा काम उनकी आज्ञाओं का पालन करना है ?’
और सीम से वे पांच लशें दोबारा वापस एौंकप लई गई । उनमें सईदखान की लश भी थी ।
सईद खान उसकी गोली का शिकार होकर मरा था । उसे उस बात का दुख नहीं था दुख इस बात का था मरने के कई दिनों बाद भी उसकी लश बे कपकन है । उसके देशवासी, जिस देश की सेना के लिए उसने अपनी जान निछावर कर दी वे लेग भी उसे अपनाने के लिए तैयार नहीं है ।
जिस मिटटी से उसने जन्म लिया है क़्या उस मिटटी में वह दपकन हो पाएगा ? या उस किसी दूसरी मिटटी में जगह मिलेगी ?
उसे बार बार याद आ रहा था । एक बार उसने सईद खान से कहा था
‘‘सईद खान, जिस धरती की ओर तुम अपनी आपावित्र नजरों से देखते हो, जिसकी पावित्रता तुम अपने आपावित्र कदमें और इरादों से आपावित्र करने का इरादा रखते हो उस धरती का सीना इतना विशाल है कि समय आनेपर एक दिन यही धरती तुम्‍हें अपनी बाहें पैकलकर अपना लेगी और तुम्‍हें अपनी गोद में जगह दैगी ।’’
आज जब वह सोचता है तो उसे विश्वास ही नहीं होता है कि इतनी जलदी उसकी बात सही सिद्ध हो जाएगी ।
क़्योंकि सईदखान और दूसरी लशों के बारे में पैकसल हो चुका है ।
‘‘हम आखिर कब तक उन लशों को संभालते रहेंगे उपर से आदेश आने के बाद किसी स्वयं सेवी संस्था के हवाले कर देंगे वह उनका आन्तिम संस्कार कर देगी ।’’
‘आंतिम संस्कार’ सोचकर उसके होठोंं पर कडवी मुस्कान पैकल जाती थी । उसे कब्र में दपकन कर दिया जाएगा भरत मता की गोद में वह सिर रखकर हमेशा के लिए सो जाएगा । उस भरत मता की गोद में जिस.... । जहा वह पैदा हुआ वहां की उसे ना तो तीन मुठ्ठाी मिटटी मिल पाएगी और ना दो गज जमीन ।
उसके मित्र, साथी, रिश्तेदार कोई भी उसकी मौय्यत को कांधा नहीं दे पाएंगे वह परायों के कांधो पर सवार होकर अपनी आन्तिम यात्रा के लिए जाएगा। क़्या एक देश पर जान निछावर करनेवाले का ऐसा ही आंत होता है ?
नहीं देश पर जान निछावर करने वालों के लिए तो फूलों के ढेर लग जाते है । वे मिटटी में दपकन नहीं होते । इतिहास बनकर इतिहास के पन्नों पर पैकल जाते है । परंतु वे जो मतॄभूमि की रश करते है । किसी की मतॄभूमि हडपने के लिए जो सईदखान की तह आगे कदम बढाते है शायद उनका आंत सईद खान सा ही होता है....
सईद खान का कहना था
‘‘दलबीर कश्मीर हमरा है, हम लेकर रहेंगे । बचपन से हमरे जेहन मं यह बात डाली गई है । तुमने बांग्लादेश के नाम पर हमरा एक बाजू तोडा है हम कश्मीर के नाम पर तुमहारा आधा सिर काट देंगे ।’’
‘‘सईद, दलबीर जैसे लखों लेगों के सिर कट जाएंगे मगर भरतमता के सिर का बाल भी बांका नहीं होगा ।’’
उसका उत्तर होता था ।
दोनों जब भी मिलते थे इस विषय पर दोनों में झडपे होती थी । परंतु गरम गरम चर्चा और झडपों के बाद भी जब वे एख दूसरे से बिदा होते थे तो हंसते हंसते बिदा होते थे ।
वे दोनों कब एक दूसरे के दोस्त बन गए थे उन्‍हे पता ही नहीं चल था।
इससे पहले वह पूंछ सेक़्टर में था ।
पूरे क्षेत्र में दोनो देशों की सेनाएं आमने सामने थी । रोजाना एक दूसरे पर गोलबारी होती, झडपे होती, और युद्ध सा समं बंध जाता था ।
दोनों देश की सेनाओं के लिए सीम से आधिक युद्ध स्थल वह छोटा सा झरना था जहा पर से दोनों सेनाएं पीने की पानी लेती थी और और उसी में दोनों देशों के सैनिक स्नान इत्यादी भी करते थे ।
झरना नो मेन लॉण्ड मे था दोनो देश उसपर अपना कोई दावा नहीं कर सकते थे ।
यह तय किया गया था कि झरने की पाकिस्तानी सीम से पाकिस्तानी सैनिक पानी लोंगे, भरतीय सीमे से भरतीय सैनिक पानी भरने या स्नान के लिए दोनों सैनिक साथ साथ जाते । आमना सामना होता और जरा जरा सी बात पर झडपें हो जाती । गोलियां और तोपें चलने लगती ।
थककर दोनों ओर के आधिकारियों ने तय किया कि दोनो सेनाएं एक एक दिन झरने से पानी भारेंगी । जब एक सेना की पारी तो हो दूसरी सेना का कोई भी सिपाही वहां नहीं पकटकेगा ।
उस निर्णय के बाद झरने पर रोज रोज होने वाली मरपीट बंद हो गई थी ।
दोनों सेनाएं उस नियम का पालन कर रही थी । एक दिन दलबीर अपने साथियों के साथ झरने पर स्नानकर रहा था कि आचानक उसका एक साथी चींखा -
‘‘ओए पाकिस्तानी सिपाही, जान की खैरियत चाहता है तो यहां से चल जा । आज तुमहारी बारी नहीं हमरी बारी है ।’’
वह हाथ उपर उठाए उनके समीप आया
‘‘मुझे आज गुस्ला (स्नान) की हाजत (आवश्यकता) है । गुस्ला नहीं एिकाय तो नमज नहीं पड सकता । हमरी पारी कल है कल तक गुस्ला नही किया तो मेरी पांच वक़्तों की नमज़े कज़ा (छूट) जाएगी । इसलिए मुझे आज यहां नहाने दों ।’’
उसकी बात सुनकर सबने कुछ सोचा फिर उसने उत्तर दिया
‘‘ठीक है नहा ले ।’’
उसने स्नान कर लिया फिर जाते हुए बोल
‘‘सईद खान तुम लोंगो का यह एहसान जिंदगी भर नहीं भूलेगा ।’’
वह सईद खान से उसकी पहली मुलकात थी ।
फिर मुलकातें होती रही ।
आक़्सर चांदनी रातों में दोनों अपनी अपनी सेनाके एौंकपो से निकलकर दूर किसी टीले पर जा बैफ़्ते और घंटो आपसमें बातें करते थे, अपने अपने परिवार वालों के बारे में ।
उसे मलूम था उसकी पत्‍नी का नाम सूबी है, उसके दो बच्चे है, गरीब मं-बाप है । एक जवान बहन है ।
सईद खान को भी उसके परिवार के बारे में सब कुछ मलूम था ।
दोनों जब मिलते तो पहले एक दूसरे के घरवालों के बारे में ही पूछते।
घरसे पत्र आया है तो उसमें क़्या लिखा है ।
कभी कभी, भरत पाक संबंध, आतंकवाद, कश्मीर के बारे में उनमें गरम गरमी भी हो जाती थी ।
परंतु फिर सामन्य हो जाते थे ।
दलबीर के साथी उसे टोकते भी थे ।
‘‘ओए दलबीरे ...... तुझे क़्या भरतीय सेना में कोई दोस्त नहीं मिल जो एक पाकिस्तानी सैनिक से दोस्‍ती की है...’’
‘‘ओए दोस्‍ती की नहीं जाती, हो जाती है । पता नहीं इस दोस्‍ती में वाहेगुरू की क़्या मर्जाी है ....’’
फिर एक दिन सईद ने बताया
‘‘मेरी एक दूसरी जगह पोस्टाींग हो गई है । कहा मुझे भी नहीं
मलूम । जिंदगी रही तो फिर मुलकात होगी ।’’ सईद चल गया । परंतु वह उसे भूल नहीं सका । महीनों फिर उसकी खबर नहीं मिल सकी और खबर मिलने का कोई स्रोत भी नहीं था ।
महीनों बीत गए ।
फिर कारागिल में लहाई छिह गई और उनकी बटालियन को कारागिल जाने का आदेश मिल ।
उंची उंची काफ़्नि पहाडी ठिकानों पर आतंकवादी, घुसपैठी और पाकिस्तानी सैनिकों ने अपने ठिकाने बना रखे थे । भरतीय सेना एक एक करके उन ठिकानो को वापस कब्जे में लेकर उनको वहां से खदेडने में लगी थी ।
वह आन्तिम शिखर थी जब उसका सईद खान से सामना हुआ ।
उसको उसने दूर से ही पहचान लिया था । परंतु उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह सईद खान ही है ।
भरतीय सेना आगे बढ रही थी और चोटी पर डेरा जमए घुसपैटियों के लिए पकरार के रास्ते बंद करती जा रही थी ।
घुसपैटियों को जब लगने लगा कि अब उनका बचना मुश्किल है तो वे भागने लगे ।
परंतु कुछ मुकाबले पर डटे रहे ।
उनमें सईद खान भी था ।
और आखिर सईद खान उसकी गोलीका शिकार हो गया ।
उसने उसकी लश कई बार उलट-पलट करके देखी थी उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह सईद खान ही है ।
परंतु वह सईद खान ही था ।
और अब कई दिनों से उसकी लश बे कपकन व कब्र पडी थी । उसकी सेना उसे अपना सैनिक मनने से इंकार कर रही थी ।
पता नहीं उसके घरवालों को उसकी मौत की सूचना दी गई भी है या नहीं । या उसके मरने का जीवन भर उसके घर वालों को पता नहीं चल सकेगा। उसके घर वालों को यही आश्वासन दिया जाता रहेगा कि सईद खान ठीक है । उसे छुटटी देना संभाव नहीं है और वे जीवन भर उसके वापस आने की राह तकते रहेंगे ।
कल शायद सईद खान भरत की धरती पर इस धरतीमं की गोद में मीठी नींद सो जाएगा । उसे आन्त वही पनाह मिली । जिस धरतीमं को आपावित्र करने के लिए उसके देश के राजनेताओं ने उसे भेजा था ।
काश वे धरती की महानता को समझते तो ऐसा नापाक कदम ना उफ़्ते ।........... द द
अप्रकाशित
मौलिक
------------------------समाप्‍त--------------------------------पता
एम मुबीन
303 क्‍लासिक प्‍लाजा़, तीन बत्‍ती
भिवंडी 421 302
जि ठाणे महा
मोबाईल 09322338918
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Hindi Short Story Worli Gutter ke Upar By M.Mubin

कहानी वरली गटर के उपर लेखक एम. मुबीन
उस रात समुद्र कुछ ज्यादा ही आक्रोश में था । क्रोधमें भारी लहरें बलखाती उठतीं और आकर गटर की दीवार से अपना सिर पटककर अपने आस्तित्व का आंत कर देती ।
कोई कोई लहर का पानी, या लहर का कोई आंश आकर उसके झोंपडे से टकराता । लकडी की पकलटियों से बनी झोंपडे की दीवार कांप उठती, उसके छेदों से पानी भीतर आकर उसके शरीर से टकराता तो उसके शरीर में एक झुरझुरी सी दौह उठती ।
झोंपडे का पूरा पकर्श पानी से भीगा था । कहीं भी इतना स्थान भी नहीं था कि वह पैर रख सके । उसने पहले ही बिस्तर को समेट कर एक कोने में रख दिया था । और भीगे पकर्श के एक कोने में बैठा कमरे में बढते पानी के स्तर को देख रहा था ।
उसके लिए यह कोई नया अनुभव नहीं था । साल में कभी कभी तो सैंकडो राते उसे इस प्रकार से गुजारनी पडती थी ।
और विशेष रूप से वर्षा की रातें, आमवस और पूनम की रातें जब समुद्र पूरे उ फान पर होता है । समुद्र का तो ठीक है आनुमन लगाया जा सकता है कि ज्वार भाटा का समय क़्या है और समुद्र किस स्थिति में होगा ।
परंतु गटर के बारे में कोई कैसे आनुमन लगा सकता है ? वह तो कभी भी उबल सकती है, और उसके गंदे पानीका स्तर बढ सकता है । स्तर बढने और गटर उबलने के कारण वह पानी समुद्र में जाने के साथ साथ उसके घर में भी घुस सकता है । यदि समुद्र का सारा पानी भी झोंपडे में भर जाए तो आधिक कळ की बात नहीं थी । ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता था कि खारा पानी शरीर से टकराने के बाद त्वचा में खुजली पैदा करता था और सारे शरीर को खुजाना पडता था और खुजली के स्थान पर नमकीन पानी लगता था तो खुजली की तीव्रता इतनी बढ जाती थी जैसे किसी ने आग पर पेट्रोल डाल दिया हो । परंतु गटर के पानी का घर में घुसने का प्रकोप ही कुछ आलग था । मस्तिष्‍क को फाड देने वाली दुर्गंध में बसा पानी और दुर्गंध भारे गीली मीटटी , और दुर्गंध भारा कीचड जब घर में घुस आता था तो, सापक पानी से धोने के बाद भी दो, दो, तीन, तीन दिनों तक घर से दुर्गंध नहीं निकलती थी । दुर्गंध सहने का तो खैर वह आफ्रयस्त हो चुका था । उसके नथुने अब सुगंध और दुर्गंध का अंतर ही अनुभव नहीं कर पाते थे । उसे अनुभव होता था जिस प्रकार मुंह में थूक रहा है । और उस थूक का एक स्वाद है जो मनव जीवन का एक आंग है उसी प्रकार नत्थुनों में दुर्गंध का रहना भी जीवन का एक रंग है । उसके जीवन का एक आंग गत एक वर्ष से वह यह सब सह रहा था और इन बातों का आफ्रयस्त हो गया था उसके लिए यह कोई आसामन्य बात नहीं थी ।
उसने अपना ठिकाना ऐसे स्थान पर बनाया था जहा ठिकाना बनाने की कोई कल्‍पना भी नहीं कर सकता है ।
वरली गटर के उपर उसका झोंपडा था । वरली की वह एक गटर, जिसमें सारे मुंबई शहर की गंदगी बहकर आती है और समुद्र से मिलती है । गंदगी में तो सभी कुछ होता है । मल, मुत्र, एसीड, सुगंध, दुर्गंध, इतर केमीकल इत्यादी ।
सारी मुंबई का ूकडा, करकट, कचरा हजारों गटरों से बहता, धरती के भीतर ही हजारों प्रकार की केमिकल प्राकिया करता, नए नए पद्यार्थी में परिवार्तित होता उस महागटर तक पहुंचता था जो इसे समुद्र के वश में उंढेल देती थी ।
वरली में इस प्रकार की कई गटरे है, उनमें से कुछ का मुंह केवल समुद्र में खुलता था । परंतु शायद वह एक मत्र ऐसी गटर थी जो पता नहीं कहा से भूगर्फ्रा मर्ग से आती थी परंतु समुद्र से 100 मिटर के लगभाग खुल कर किसी नाले का रूप धारण कर लेती थी और फिर वह नाले के रूप में समुद्र से मिलती थी ।
उस गटर की चौडाई 20 फुट के लगभाग होगी । गटर के दोनों और सिमेंट कां#कीट की दीवारे थीं और दीवारों से दोनों ओर की बिल्डिंग के एंकपाऊंड की उंची दीवारों के बीच, 15, 20 फुट की खाली जगह थी । जो गटर के उबलने से गटर के साथ आई गंदगी से भारी हुई थी ।
मुंबई जैसे महानगर में इतनी बडी खुली जगह, इसकी तो कोई कल्‍पना भी नहीं कर सकता है । परंतु गटर के दोनों ओर की जगह खुली थी और बरसों से खुली थी ।
उस जगह पर ना तो किसी ने कब्जा करके अपना घर बनाया था ना दुकान शुरू की थी ना अपना सामन रखने के लिए गोडावून बनाया था । उस क्षेत्र में इन चीजों के बनाने की कल्‍पना करना तो दूर उस क्षेत्र में प्रवेश करने की कल्‍पना तक कोई नहीं कर सकता था ।
सारी मुंबई की सडांध और दुर्गंध का सहने की शाएिक़्त किसी भी इन्सान में नही थी । परंतु उसने वही झोंपडा बनाकर उस कल्‍पना के परे लगने वाली बात को झुटल दिया था । और वह गत एक वर्ष से रह रहा था इस बीच उसका आनुकरण करके शेष खुली जगह पर किसी ने भी झोंपडा बनाने का साहस नहीं किया था ना किसी ने उसे झोंपडा बनाने पर टोका था ।
उसने झोंपडा बिल्डिंग के एंकपाउंड की दीवार से लगकर समुद्र की दीवार से लगकर बनाया था । गटर की दीवार से 10-15 फुट दूर ।
वहां गटर की दुर्गंध सामन्य दीनों में कम पहुंचती थी । समुद्र की खारी हवाओं के झुक़्कड ज्यादा चलते थे । परंतु गटर जो गंदगी लकर दोनों ओर उंडेल देती थी उस गंदगी से बचना तो आसंभाव सा था । वह उस गंदगी के बीच से लख आने जाने के लिए रास्ता बनाता था । दो-चार घंटे के बाद गटर की नई गंदगी उस रास्ते का स्थान ले लेती थी । उसे उसी गंदगी से आना जाना पडता था ।
वही था जो वहां आता जाता था । दूसरा कोई उस क्षेत्र में प्रवेश करने का दुस्साहस नहीं करता था । जैसे वह एक निषिध क्षेत्र हो और उस क्षेत्र में केवल उसी को प्रवेश करने की आनुमती हो । वह स्थान एक वर्ष पूर्व आचानक एक दुर्घटना के कारण खोज निकाल था ।
दुर्घटना भी सामन्य सी थी ।
एक रात वह अपने दो-चार पारिचितों के साथ फुटपाथ पर सो रहा था। रात के 2 बजे के समीप जब वे सब गहरी नींद में सोए हुए थे आचानक एक पुलिस जीप आई और सिपाही उनपर डंडे बरसा कर उन्‍हे जगाने लगे जो जाग जाता उसे पकडकर जीप में डाल देते ।
दो-तीन डंडे खाने के बाद उसकी भी आंख खुल गई । समीप था कि दो सिपाही पकडकर उसे भी जीप में डालते, खतरे को अनुभव करके वह सिर पर पैर रख कर भागा । सिपाही भी उसके पीछे दौडे । वह सरपट भागा जा रहा था । उसका आनुमन था कुछ दूर उसके पीछे आकर सिपाही वापस चले जाएंगे परंतु सिपाहियों ने भी उस दिन शायद तय कर लिया था कि वे उसे आज हवालत में डालकर ही रहेंगे । इसलिए वे भी उसके पीछे जान तोडकर भाग रहे थे ।
अपने पीछे सिपाहियों का इस प्रकार दौडना उसके मस्तिष्‍क में खतरे की घंटिया बजा रहा था । यदि वह पकडा गया तो सिपाही उन्‍हे इस प्रकार कळ पहुंचाने का बदल जरूर ले ंगे । उसके सारे शरीर पर लफ़्यिों के दाग लगाकर और फिर पता नहीं कौनसा आरोप लगाकर जेल में डाल दे । किसी पर पोटा लगा देना या किसी को इन्काउंटर में मर डालना मुंबई पुलिस का तो बाए हाथ का खेल है । इसलिए आज इनसे बचना बहुत जरूरी है । बस इसी विचार के आते ही वह गटर के बाजू की खाली जगह में घुस गया ।
वहां बहुत अंधेरा था । उसे कोई देख नहीं सकता था । परंतु वहां घुसते ही दुर्गंध का एक तू फान उसके मस्तिष्‍क में घुसा और उसे अनुभव हुआ यह दुर्गंध का तू फान उसके मस्तिष्‍क की धाज्जियां उडा देगा । परंतु एक संभावित खतरे से बचने के लिए वह अपने पैरों के नीचे की गंदगी को रौंदता आगे बढा जा रहा था ।
होश उस समय आया जब समुद्र से एक लहर उफ़्लाती हुई उठी और ‘शडाप’ से किनारे पर बनी दीवार से टकराकर अपने आस्तित्व का आंत कर गई और उसे फ्रिगो गई । ‘बापरे ... आगे तो समुद्र है....’ वह बडबडाया और वही रूक गया ।
उसने पीछे मुडकर देखा । सामने घोर अंधेरा था कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था । सिपाही गटर की दुर्गंध सहन ना करके वापस चले गए थे ।
अंधेरे में टटोलकर वह आगे बढा और बिल्डिंग के एंकपाउंड की दीवार से पीठा लगाकर बैठा गया । उसके चारों ओर विचित्र दृश्य था । एक ओर शोर करता समुद्र, उसकी लहरे, और शरीर से टकराता खारा पानी ।
तो दूसरी और गंदगी, गटर से उठती दुर्गंध और दूर दूर तक पैकली हुई गंदगी का ढेर ।
वह दीवार से पीठा लगाए सो गया । आंख खुली तो सूरज चढ आया था। अब उसके सामने हर दृश्य स्पळ था ।
एक और मौजें मरता नील समुद्र, तो दूसरी और सारी मुंबई की गंदगी जम करके लने वाली और उस गंदगी को समुद्र में छोडने वाली वह गटर और उसके चारों ओर पैकली गंदगी और वह दीवार जिस से पीठा लगाकर वह बैठा था ।
सूरज के चढने के साथ दुर्गंध की तीव्रता भी तेज होने लगी और समुद्र की खारी हवा का खारापन भी बढने लगा ।
गंदगी को रौंदता हुआ वह सडक पर आया तो दुर्गंध का बसेरा बना हुआ था । अपने निश्चित स्थान पर आकर उसने पता लगाया तो पता चल कि उसके चार साथी पकडे गए थे । पुलिस आज भी इस स्थान पर छापा मरने वाली है । वह डर गया । रात वह बच गया परंतु आज रात बच नहीं पाएगा ।
उस दिन वह काम पर नहीं गया । दिनभर वह किसी सुरक्षित ठिकाने के बारे में सोचता रहा । दिनभर सोचने के बाद उसे उस गटर से सुरक्षित स्थान और कोई दिखाई नहीं दिया । शाम से पहले उसने अपना सामन उफ़्या और उस गटर की ओर चल दिया ।
रात होने से पहले दीवार से लगकर उसने सापक स फाई करके सोने उठाने बैफ़्ने के योग्य ठिकाना बना लिया था ।
दो-चोर दिन उसके आराम से भी गुजरे और उसने स्वयं को उस वातावरण के आनुरूप ढालने का प्रयत्न भी किया ।
गटर की गंदगी और दुर्गंध का आदी बनना और समुद्र के पानी और हवाओं के थपेडों को सहना । दिनभर वह अपना काम करता था । काम क़्या था यही मजदूरी । रात वहां आकर लेटता तो इतना थका हुआ होता था कि थकान के कारण तुरंत नींद लग जाती थी । रात में एकाधबार आंख खुली तो खुली वरना उसी समय आंख खुलती थी जब पौ पकट जाती थी ।
वह मुंबई के उन लखों लेगों में से एक था जो पेट भरने के लिए मुंबई आए थे किसी काम की खोज में । उन्‍हे काम तो मिल जाता था, पेट भी भर जाता था, परंतु उनके पास सिर छिपाने के लिए कोई स्थान नहीं होता था और वह इधर उधर सोकर अपनी रात गुजार देते थे । परंतु वह भाग्यशाली था उसे सो ने के लिए ठिकाना मिल गया था ।
उसने अपने एक दो साथियों को उस ठिकाने के बारे में बताया तो वे उस पर बरस पडे ‘सरजू तू पगल गया है । उस गंदगी में जाकर सोता है । दुर्गंध से किसी दिन मर जाएगा । स्वयं तो मरने पर उतारू है, हमें भी मरना चाहता है । अरे हम वहां सोना तो दूर कदम भी नहीं रख सकते ।’
इस प्रकार उसके साथ वहां रहने कोई भी तैयार नहीं हुआ ।
इस बीच उसे नए अनुभव हुए । कभी समुद्र की लहर दीवार तक आ जाती और उसे पानी में फ्रिगो देती । तो कभी जब गटर उबलती तो उसका गंदा पानी और गंदगी उसे भी फ्रिगो जाता ।
उनसे बचने के लिए उसने वहां एक छोटी सी झोंपडी बनाने की सोची। कुछ लकडी के टुकडे, प्लास्टिक, बांस इत्यादी उसने जम किए और एक मस के कठोंर पारिढ़ाम से अपने लिए उस स्थानपर एक झोंपडा बना लिया । अब रात या दिन में उसे समुद्र की लहरें फ्रिगों नहीं पाती थी । ना गटर की गंदगी उसके घर के भीतर आ पाती थी । हा कभी कभी गंदा पानी जरू जा जाता था ।
बाजू वाली बिल्डिंग के एक इलेएिक़्ट्रक पोल से उसने वायर जोडकर अपने झोंपडे मे बिजली भी ले ली और एक पंखा भी लगा लिया । बिल्डिंग के एक नल से प्लास्टिक का पाईप जोडकर उसने अपने घर में पानी का प्रबंध भी कर लिया ।
अब ना उसे बिजली की कमी थी और ना पानी की । दिन भर वह अपना काम करता था और रात को आकर सो जाता था ।
फिर एक दिन उसने अपना मेहनत मजदूरी वाल काम भी छोड दिया। क़्योंकि काम तो उसके चारों और बिखरा हुआ था ।
गटर अपने दोनों ओर जो गंदगी पैकल जाती थी उस गंदगी में प्लास्टिक की बोतले, चीजें और पता नहीं क़्या क़्या होता था ।
वह उस गंदगी से वे चीजें जम करता उन्‍हे सापक करके फ्रांगार वालों को बेचता तो उसे आच्छे खासे पैसे मिल जाते थे ।
‘सूरज बाबा’ उसने सोचा ‘जब घर के सामने इतना अच्‍छा काम हो तो फिर काम के लिए इधर उधर भाटकना मुर्खता नहीं तो और क़्या है ।’
परंतु जरूरी नहीं था कि गटर रोजाना अपने साथ जो गंदगी लकर पैकलए उनमे वे चीजे मिले ही । कभी कभी तो सारी पैकलई हुई गंदगी उथल पुथल करने के बाद किसी वस्तु का एक टुकडा नहीं मिलता था । और आंखो के सामने ढेर सा सामन बहते हुए समुद्र में जाता दिखाई देता था ।
उसका भी उसने एक मर्ग निकाल दिया ।
जब भी उसे गटर में कोई बडा सामन बहता हुआ दिखाई देता वह अपनी पीठा को रस्साी बांद कर गटर में ूकद पडता था । गंदगी में तैरना लेग कहते है बडे दिल जिगर का काम है । गंदगी दलदल के समन अपने भीतर हर वस्तु को खेंचती है फिर गंदगी, दुर्गंध, मल, मुत्र ।
परंतु वह तो इन चीजों का आदी हो गया था । उसके लिए सुगंध, दुर्गंध का आस्तित्व ही समप्त हो गया था ।
जहा तक दलदल में डूबने की बात थी कमर में बंधी रस्साी उसे डूबने नहीं देती थी । यह काम उसके लिए बहुत लभाकारी था । क़्योंकि गटर से इस प्रकार उसके हाथ कभी कभी ऐसी चीजें भी लग जाती थी जो हजारों रूपयों में बिकती थी ।
इस प्रकार उसका काम धंदा भी अच्‍छा चल रहा था । नल में 24 घंटे सापक पानी आता था इसलिए गटर से निकलने के बाद जब उस पानी से स्नान कर लेता था तो शरीर से सारी गंदगी दूर हो जाती थी ।
यदि नल नहीं भी आ रहा होता था तोभी कोई समस्या नहीं थी ।
समुद्र की दीवार के पास खडा हो जाता तो बार बार फिर उठाने वाली विद्रोही लहरे स्वयं ही उसे फ्रिगों के उसके शरीर की सारी गंदगी सापक कर देती थी ।
उस रात ठीकसे सो नहीं सका और सवेरे आंख खुल गई । नाश्ता करने के लिए बाहर आया तो फ़्फ़्कि गया । वह स्थान जहा पर गटर भूगर्फ्रा से निकलकर नाले के रूप में समुद्र की ओर बढती थी वहां भीड थी । वह भी भीड में शामिल हो गया ।
दो-तीन टी.वी. के कैमरा मेन भी थे और कुछ नेता टाईप के लेग
थे । टी.वी. वाले गटर के हर कोने से चित्र ले रहे थे कैमरे के लौन्स दुरूस्त करके गटर, और गटर की गंदगी को अच्‍छी तरह अपने कैमरों में कैद करने की कोशिश कर रहे थे ।
एक कैमरा मौन नेता लेगों के भाषण रिकार्ड करा रहा था
‘यह है वह गंदगी का ढेर, वह गटर जो सारे शहर की गंदगी लकर यहां समुद्र में डालती है और समुद्र को प्रदुषित करती है । समुद्र के प्रदूषण का आर्थ है पर्यावरण के संतुलन को बिगाडना और इस संतुलन के बिगडने का आर्थ है धरती का आंत... तो यह सरकार इस धरती के आंत के पीछे लगी है । यह मानवता को धरती से खत्म करने की घिनौनी साजिश है । हमरी मंग है इस घिनौने षडयंत्र को रोका जाए शहर का गंदा प्रदुषित पानी कहीं और डाल जाए। समुद्र को प्रदुषित होने से बचाया जाए इसके लिए हम आंदोलन करेगें । हमें इस आन्दोलन के लिए जनता का सहयोग चाहिए ।
‘‘सभी नेताओं के भाषण हो गए तो किसी की नजर उसपर पडी । पूछने पर जब उसने बताया कि वह गटर के उपर बने उस झोंपडे में रहता है । तो टी.वी. वालों की बांछे खुल गई तुरंत उसे खेंचकर टी.वी. के सामने कर दिया गया ।’’
‘‘यह सरजू जी है जो गत एक वर्ष से इस गटर के उपर रह रहे है इस गटर द्वारा क़्या क़्या गंदगी समुद्र में मिलती है । यह हमें बेहतर तौर पर बता सकते है..’’ उसके बाद टी.वी. वालों ने उस पर प्रश्नो की वर्षा कर दी ।
वह अपनी टूटी फूटी भाषा में उनके प्रश्नो का उत्तर देता रहा ।
जाते समय वे उससे कह गए
‘शाम को टी.वी. देखना तुमहारा भी बयान आएगा’ परंतु वह टी.वी. नहीं देख सका । उसके घर टी.वी. नहीं थी ।
दो तीन दिन बाद पता चल कि हर चैनल उस गटर के बारे में कार्यक्रम दोहरा रहा है नेता लेग के बयान आ रहे है । और कभी कभी उसे भी टी.वी. पर दिखाया जाता है ।
अब आखबार वाले भी जागे । गटर के किनारे कैमरा वालों की भीड सी रहने लगी कोई भीतर घुसने का साहस नहीं करता था । दूर से ही गटर के चित्र लेकर चले जाते थे ।
गटर के बारे में धरने दिए जाने लगे और मेर्चे निकलने लगे ।
विपक्ष ने और कुछ विधायकों ने विधान सभा में इस विषय पर सी.एम.को बुरी तरह घेरा और दो घंटे सदन की कार्यवाही चलने नहीं दी विवश होकर सी.एम. ने बयान दे दिया वे जांच करके इस संबंध में तुरंत निर्णय लोंगे । उन्‍हों जांच का आदेश दे दिया । अब गटर के आरंफ्रिक छोर पर एक मेल सा लग गया था ।
बडी बडी कीमती गाडियां वहां आकर रूकती उनसे कीमती वस्र पहने मेटे ताजे लेग नाक पर रूमल रख कर उतरते । एक उचटती सी द़ष्टि गटर और उसकी गंदगी पर डालते और जाकर सामने की फाईस्टार होटल में बैफ़्कर पता नहीं क़्या बातें करते । कभी कभी सूरज की तरह कोई गंदा आदमी भीतर आता और गटर के नमूने जम करके उन साहबों को दे देता । कभी गंदगी के ढेर से थोडी सी मिटटी लेकर पॅकटों में पैक करके उन्‍हे दे देता ।
यह चीजें प्रयोगशालओ में भेजी जाएगी । और पता लगाया जाएगा इनमें कौनकौनसे तत्व है जो प्रदूषण को बढाते है या जो समुद्राी और मनवी जीवन के लिए हानीकारक है । पूछने पर उसे उस व्‍यक्तिने विजयी आंदाज में बताया ।
क़्या चल रहा था उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था । परंतु इस बात का उसे आनुमन हो रहा था उस पर आपकत आने वाली है । इन गटरों को यहां से हटाने के लिए यह आन्दोंलन चल रहा है ।
उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था । इन गटरों को यहां से हटाने की बात क़्यों की जा रही है । यह गटरें तो यहां पचासों सालों से है । अब तक किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया । किसी ने आन्दोलन नहीं किया कि यहां से इन्‍हे हटाया जाए ।
अब जब उसने अपना सिर छिपाने के लिए यहां पर एक सुरक्षित ठिकाना बना लिया है इन गटरों को यहां से हटाने की बात की जा रही है और फिर जरूरी नहीं कि इन गटरों से सिर्फ गंदगी ही आए ।
कभी कभी तो इन गटरों से दूध भी आता है । दूध जो सडकों पर दुकानों मे 20 रूपया लिटर मिलता है । परंतु लखों लीटर दूध इन गटरों में बहकर आता है और समुद्र से मिल जाता है । उसने जब इस बारे में एक विद्वान से पूछा था तो उसने बताया था
‘दूध बनाने वाली एंकपानियां दूध की कीमतों को स्थिर रखने के लिए जरूरत से ज्यादा आया दूध गटरों में बहा देती है । यदि वे वह दूध बाजार में बेचे तो ज्यादा दूध के कारण दूध की कीमते गिर जाएगी और उन्‍हे लखों का नुकसान होगा । इसलिए जरूरत से ज्यादा आए दुध को गटरों में बहा दिया जाता है ... भाले गरीबों के बच्चे दूध की एक एक बूंद को तरस्ते रहें....।’
आखबारों और टी.वी. पर उस गटर के बारे में बहुत कुछ आता रहा ।
जब भी कोई आवाज या शोर उठता सी.एम. यह कहकर आवाज दबा देते ।
‘‘हमने गटर की गंदगी और पानी के नमूने प्रयोगशाल में भेजे है उनकी जांच हो रही है जांच के रिपोर्ट आने के बाद इस संबंध में तुरंत कार्यवाही की जाएगी मैं आपको विश्वास दिलता हूं ।’’
रिपोर्ट आ गई ।
रिपोर्ट क़्या थी उसमें यही था कि उस गटर की गंदगी, पानी में कुछ ऐ से जहरीले तत्व भी शामिल है जिससे समुद्र के जीवन को खतरा है । इस रिपोर्ट के आने के बाद पर्यावरण वालों का शोर कुछ ज्यादा ही बढ गया ।
धरने मंत्रालय के साथ साथ गटर के छोर पर भी दिए जाने लगे ।
हर किसीकी आवाज तेज से तेज तर होती जा रही थी जिससे सरकार और सी.एम. के कानों के परदे पकटने लगे ।
घबराकर उन्‍हों घोषणा कर दी ।
‘‘पर्यावरण को बचाया जाएगा । समुद्र के जीवन और पानी को प्रदुषित होने नहीं दिया जाएगा । सरकार 100 करोड खर्च करके उन गटरों पर ऐसे संयत्र लगाएगी जो गंदगी और विय्रैली तत्वको सापक करके शेष पानी समुद्र में छोडेंगे ।’’
100 करोड वाली स्काीम पर कार्य आरंभा हो गया । बडा संयत्र लगाने के लिए जगह की स फाई की गई । गटर के दोनो ओर की गंदगी वापस गटर मे डाल दी गई उसका घर झोंपडा तोड डाल गया ।
अब उसकी जगह गंदगी सापक करने वाल करोडो रूपयों का संयत्र लगने वाल था और सूरज बेघर गटर के किनारे उदास बैठा सोच रहा था अब ठिकाना कहा बनाए ? द द
अप्रकाशित
मौलिक
------------------------समाप्‍त--------------------------------पता
एम मुबीन
303 क्‍लासिक प्‍लाजा़, तीन बत्‍ती
भिवंडी 421 302
जि ठाणे महा
मोबाईल 09322338918
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Hindi Short Story Azan By M.Mubin

कहानी अज़ान लेखक एम. मुबीन
शायद वह रात का आन्तिम पहर था । नियम के आनुसार आंख खुल गई थी । उसने आनुमन लगाया उस समय शायद चार बज रहे ड़ोंगे । आज आंख नियम से कुछ पहले ही खुल गई थी ।
अब आंख बंद कर के लेटे रहने से भी कुछ मिलने वाल नहीं था । नींद तो आने से रही, सवेरे तक करवटं बदलते रहने से अच्‍छा है बाहर आंगन में बैफ़्कर सवेरे की ठंडी ठंडी हवा के झोकों का आनंद लिया जाए ।
यह सोचकर उसने बिस्तर छोड दिया । चारों ओर आंधकार छाया हुआ था । घर के बाहर आंगण में बंधे पशुओं ने आंधकार में भी उसकी आहट सुनली या उन्‍हों उसकी पारिचित गंध से उसकी उपास्थिती का आनुमन लगा लिया था। वे भी अपनी अपनी भाषा में आवाजे लगाकर उसे अपनी उपास्थिती का आभास दिलने लगे ।
‘अच्‍छा बाबा मुझे पता है तुम लेग जाग रहे हो.. आता हूं’ कहता वह पशुओं के समीप आया ! उसे देखकर गाय ने मुंह से कुछ स्वर निकाल ।
‘‘अब चुप भी हो जा,’’ उसने गाय का सिर थपथपाया तो गाय अपनी जीभा बाहर निकालकर उसका हाथ चाटने लगी उसके बाद भैंसे, भेड, बकारियां शोर लगाने लगी ।
वह एक एक को आवाज देकर उसे चुप रहने के लिए कहता और प्यार से उन्‍हे डांटता ।
थोडी देर बाद सब चुप हो गए तो वह आंगन में रखी खाटपर आकर बैठा गया और तंबाूक निकालकर चिलम भरने लगा ।
चिलम का एक कश लेकर उसने दूर गांव पर एक नजर डाली । अंधेरे मे डूबा गांव उसे किसी भाुतिहा हवेली सा प्रतीत हो रहा था । समय धीरे धीरे सरक रहा था । क़ितीज पर हलकी हलकी ललीम दिखाई देने लगी थी । परंतु वातावरण पर वही सन्नाटा छाया हुआ था । उसके कान इस सन्नाटे को तोडने वाली एक आवाज की प्रतीश कर रहे थे ।
इस मौन के सीने को सबसे पहले चीरने वाली एक आवाज अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज ! परंतु क़ितीज पर पौ पकट गई राम, हनुमन, शंकर, विय्र्णू सभी मंदिरों की घंटियां बजने लगीं । एक साथ बजने वाले उन घंटो ने वातावरण में एक शोर उत्पन्न करके मौन के सीने को चीर कर रख दिया ।
और फिर सब शांत हो गए ।
परंतु ना तो अल्‍लाबख्‍श की आवाज ना वातावरण में उभारी ना उसे अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज सुनाई दी । एक लमबी सांस लेकर उसने अपना सिर झटक दिया ।
वह भी सचमुच बहा मुर्ख है ।
वह यह अच्‍छी तरह जानता है कि अल्‍लाबख्‍श अपने बचे हुए परिवार को लेकर कब का इस गांव को छोहकर जा चुका है ।
जिस मस्जिद के आंगन से वह आज़ान देता था वह खण्डहर बन
गई है । उसके भीतर अब हनुमान की मूर्ति रखी हुई है । फिर भाल उसे अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज किस तरह सुनाई देगी । अब तो अल्‍लाबख्‍श को गांव छोडे महीनों हो गए है । फिर भी उसके कान अल्‍लाबख्‍श की आज़ान सुनने की प्रतीश क़्यों करते है ?
शायद इसलिए कि वे चालीस वर्षो से निरंतर अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज सुनते आए थे । दिन के कोलहल में तो उसे अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज सुनाई नहीं देती थी । परंतु प्रात और शाम की आज़ान हर कोई सापक सुन सकता था । अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज सुनकर उसके मन को बडी शान्ति मिलती थी ।
यह सोचकर कि मेरी तरह मेरा मित्र भी जाग गया है, और अपने परमेश्वर की आराधना में लगा है उस खुदा की आराधना के लिए खुदा के दूसरे बंदों को बुल रहा है ।
चालीस वर्षो में ऐ से बहुत कम आवसर आए थे जब उसने अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज नही सुनी हो ।
उन आवसरों में आधिकतर वे दिन थे जब वह किसी काम से गांव से बाहर गया हो या फिर अल्‍लाबख्‍श किसी काम से घर के बाहर गया हो ।
चालीस वर्षो से वह अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज निरंतर सुन रहा रहा था परंतु वह गत साठा वर्षों से अल्‍लाबख्‍श को जानता था। ऐसा कोई भी दिन नहीं बीता था जब उसका और अल्‍लाबख्‍श का सामना ना हुआ हो । या उसकी और अल्‍लाबख्‍श की बातचीत ना हुई हो या दोनो ने साथ मिलकर तंबाूक ना पी हो ।
परंतु वही अल्‍लाबख्‍श एक दिन उस गांव को छोडकर चल गया जहा वह पैदा हुआ था, जहा वह पल बडा था, जहा उसका घर था, खेत थे वह छोटी सी मस्जिद थी जो उसने अपने हाथो से बनाई थी ।
वह जाते हुए अल्‍लाबख्‍श को रोक भी नहीं पाया था । उसमें अल्‍लाबख्‍श को रोकने का साहस भी नहीं था । वह किस मुंह से अल्‍लाबख्‍श से कहता ।
‘‘अल्‍लाबख्‍श इस गांव को छोडकर मत जाओ यह गांव तुमहारा है...... तुम इस गांव में जन्मो हो । हम सब इस गांव में साथ साथ खेले, पले बडे हुए है.. इस गांव में तुमहारी संतान हुई है । इस गांव के कब्रस्तान में तुम्‍हारे मं-बाप, दादा पता नहीं कितने पूर्वज और रिश्तेदार दपकन है । तुम इस गांव को छोडकर क़्यों जा रहे हो ? इस गांव को छोडकर मत जाओ ....’’
उसे पता था यदि वह यह कहता तो अल्‍लाबख्‍श के पास एक ही उत्तर होता...
‘‘रामजी भाई.. इस गांव ने मेरा जवान बेटा छीन लिया है । इस गांव में मेरा दूसरा बेटा आधमरा आपाहिज हो गया है । इस गांव में मेरी बड़ू की ओर आपावित्र हाथ बढे । मेरी बड़ू ने उन आपावित्र हाथों को अपने शरीर का स्पर्श देने से पहले अपने प्राण त्याग दिए इस गांव में मेरी बेटियों की इज्जत तार-तार होने ही वाली थी पता नहीं किस तरह खुदा ने उसे बचा लिया । इसगांव के मेरे उन खेतों को जलकर राख कर दिया गया जो चार महीनों तक मैंने अपने खून से सींच सींच कर लहलहाए थे । इस गांव में मेरे प्यार के शिवाले मेरे घर को खण्डहर बना दिया गया । मेरी मस्जिद को खण्डहर बनाकर उसमे मूर्तियां रख दी गई अब आगे इस बात की क़्या ग्यारंटी है कि इस गांव मे इसके बाद कभी मेरे बेटों की जान लेने का प्रयत्न नहीं किया जाएगा । मेरी बेटियों की ओर वासनाभारे हाथ नहीं उठेंगे, मेरा आराध्यगॄह उध्वस्त नहीं किया जाएगा ।’’
अल्‍लाबख्‍श की इस बात का तो किसी के पास कोई उत्तर नहीं था ।
उसकी आंखो के सामने सब कुछ हुआ था । उसकी आखों के सामने मस्जिद तोडी गई थी । उसमें हनुमनजी की प्रातिमे रखी गई थी । उसके खेत और घर जलए गए थे । उसके बेटों को त्रिशुलों से छेद छेदकर मरा गया
था । उसकी बड़ू बेटियों की ओर वासनाभारे हाथ बढे थे ।
और वह चुपचाप यह तमशा देखता रहा था । किसी को रोक नहीं सका था गांव के किसी भी व्‍यक्ति ने किसी को भी रोकनेका प्रयत्न नहीं किया था ।
जिन लेगोंने यह सबुकछ किया था वे सब उसके अपने वाले थे । उसी गांव के लेग, नवयुवक थे जो इसी गांव में पल बढकर जवान हुए थे । वे अल्‍लाबख्‍श की गोद में खेले थे । उन्‍हों उसके खेतों से आम चुराकर खाए थे ।
जिसे वे अल्‍लाबख्‍श चाचा कहते थे उन्‍हीं लेगों ने उसके परिवार वालों के साथ यह सब किया था ।
वह और उसके जैसे सैंकडो लेग तमशा देखते रहे थे । और अल्‍लाबख्‍श को सांत्वना देने, अपनी मित्रता और संबंधो का विश्वास दिलने उस समय पहुंचे थे जब उसका सब कुछ लुट गया था । जिस समय दानवता का यह नॄत्य हो रहा था उस समय अल्‍लाबख्‍श गांव में नहीं था वह बाहर गया हुआ था ।
जब वह शहर से लौटा तो इतना सब कुछ हो चुक था ।
यदि अल्‍लाबख्‍श गांव में होता और उसकी आखों के सामने यह कुछ होता तो इतना सबुकछ देखने के बाद शायद वह जिंदा नहीं बचता । या तो वह उसके बडे बेटे की तरह मर दिया जाता या फिर यह सब अपनी आखों से देखने के बाद स्वयं ही मर जाता ।
उसके बाद वह आठा दिनों तक गांव में नहीं रहा वह अपने घायल परिवार को लेकर शहर चल गया ।
शहर से वापस आने के बाद तो उस का गांव में रहना और भी काफ़्नि हो गया उसे धमकियां मिलने लगी ।
‘‘गांव छोडकर चले जाओ वरना पिछली बार जो नहीं हो सका वह इस बार होगा । पिछली बार तो तुम बच गए परंतु इस बार नहीं बच पाओगे ।’’
उस गांव में जन्मो, पल, बडे, अल्‍लाबख्‍श के हजारों दोस्त, जान पहचान वाले उस गांव मे थे । हर कोई उसे जानता था, हर किसी से उसके संबध थे ।
सब अल्‍लाबख्‍श को सांत्वना देने गए
‘जो हुआ बहुत बुरा हुआ’
‘‘यदि वह बुरा हो रहा था तो आप लेगों ने उसे रोका क़्यों नहीं ?’’ अल्‍लाबख्‍श ने उनसे प्रश्न किया तो सब निरूत्तर हो गए । इसलिए जब अल्‍लाबख्‍श ने अपने परिवार के साथ गांव छोडने का निर्णय लिया तो एक दो लेगों ने ही उसे ऐसा करने से रोका । ‘‘मैं रूक जाता हूं परंतु जो धमकियां रोजाना मुझे मिल रही है उनका क़्या होगा? हम इस गांव में पहले की तरह सुरक्षित रहेंगे?’’
‘‘अल्‍लाबख्‍श वे बच्चे है और बहक गए है और कुछ इस तरह बहका दिए गए है कि उन्‍हे राह पर लना काफ़्नि है । और तुम तो जानते हो आजकल के नवजवान किसी की कुछ सुनते नहीं है...’’
इस पर अल्‍लाबख्‍श जवाब देता
‘‘तो इस का आर्थ मुझे अपने परिवार वालों के साथ यह घर छोडना पडेगा । तुम्‍हारे बच्चे नहीं चाहते है हम लेग इस गांव में रहे उस गांव में जो मेरा अपना गांव है और तुम में अपने बच्चों को रोकने की ताकत नहीं है । इस का आर्थ है तुम भी अपने बच्चों के आपराधों में बराबर के साझेदार हो... तो ठीक है अब मैं कोई और खतरा मेल लेना नहीं चाहता... मुझे और मेरे परिवार को कहीं ना कहीं तो शरण मिल जाएगा । अल्‍लाह की जमीन बहुत बडी है...।
जिस दिन अल्‍लाबख्‍श का परिवार गांव छोडकर गया उसके जैसे कुछ लेगों को दु:ख हुआ। परंतु गांव मे उत्सव मनाया गया । अल्‍लाबख्‍श के घर और मस्जिद की इंटे तोड तोडकर अपनी विजय पर नॄत्य किया गया उसके खेतों पर कब्जा करके उसके टुकडे कर दिए गए ।
वह चल गया । परंतु उसके जाने के बाद भी उससे जुडी साठा सालों की यादें नहीं जा सकी ।
वह अल्‍लाबख्‍श जिसके साथ वह बचपन से खेलता, ूकदता आया था जिसके साथ वह गांव की स्‍कूल में पढा था, जिसके साथ वह खेत के संबंध में परामर्श और चर्चा करता था और उसे उन समस्याओं के बारे में अल्‍लाबख्‍श परामर्श देता था । ईद और बकरी ईद के दिन वह जिस के घर शीर खुरम पीने जाता था । मेहर्रम में वह जिसके घर शरबत पीता था और शुद्ध शाकाहारी खिचडा खाता था दिवाली-नवरात्र को जिसे वह अपने घर बुलता था ।
नवरात्र के त्योहार में जब अल्‍लाबख्‍श काठियावाडी वस्र पहेनकर दांडिया खेलता था तो कोई उसे पहचान नहीं पाता था कि यह अल्‍लाबख्‍श है एक मुसलामन जो गांव की इकलौती मस्जिद को मोज्जन (आज़ान देने वाल) और पेशीमम (नमज पढाने वाल) है जो गांव के मुसलामन बच्चो को आरबी पढाता है और धर्म की शिश देता है ।
सवेरे जागने के बाद अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज उसे भाली लगती थी । तो रात में जब तक उसके कानों में उसकी आज़ान की आवाज नहीं पडती उसे नींद नहीं आती थी ।
एक दिन उसने उससे पूछा
‘भाई अल्‍लाबख्‍श तुम इस आज़ान में क़्या पुकारते हो ...’
‘अल्‍लाह की तारीपक और लेगो को अल्‍लाहकी इबादत के लिए आने का बुलवा’
एक दिन उसका लडका शहर से टेप ले आया । वह टेप में सबकी आवाजें रेकार्ड करता था ।
एक दिन जब अल्‍लाबख्‍श उसके घर आया तो वह उससे बोल।
‘अल्‍लाबख्‍श तुम आज़ान पुकारो मैं तुमहारी आज़ान को टेप करना
चाहता हूं’
‘‘नहीं रामजी भाई आज़ान किसी भी समय नहीं दी जाती है। उसका समय निश्चित । उन निश्चित समय पर ही आज़ान की जाती है ।’’
परंतु अल्‍लाबख्‍श से बहुत आधिक जिद करने लगा कि वह उसकी आज़ान टेप करना चाहता है तो उसने आज़ान दी और उसने अल्‍लाबख्‍श की दी आज़ान टेप कर ली ।
‘रामजी भाई मैंने आज तुम्‍हारे घर में आज़ान दी है । इस आज़ान की शाएिक़्त से तुम्‍हारे घर में जो भी भूत, प्रेत, बलएं होगी सब भाग जाएंगी ।’
कुछ दिनों बाद सचमुच उसे अनुभव हुआ उसके घर में कई पारिवर्तन हुए है । उसका घर जिन भूत, प्रेतात्म, बाधाओं से घिरा था उसकी आज़ान से वे दूर हो गई ।
गत साठा सालों में कई बार पूरा देश सांप्रदायिक दंगो की आग से झुलसा परंतु उनकी गरम हवा कभी भी उनके छोटे से गांव को नहीं छू सकी ।
परंतु गत चार पांच वर्षो से वह बडी तीव्रता से अनुभव कर रहा था कि उसकी संतान के विचारों में बडे #कान्तिकारी पारिवर्तन आ रहे है ।
उसकी पीढाी के लेग कभी भी अल्‍लाबख्‍श या उसके धर्म के बारे में बातें नहीं करते थे । परंतु यह नई पीढाी सिर्फ अल्‍लाबख्‍श और उसके समधर्मी भार्ईयों के बारे में उसके धर्म के बारे में बाते करती रहती है । और उनकी बातों में घॄणा का विष भारा होता है ।
गांव का हर छोटा बडा अल्‍लाबख्‍श का सममन करता था परंतु यह पीढाी आवसर मिलने पर बात बात पर अल्‍लाबख्‍श की हदतक विडमबन करने का प्रयत्न करती है । उससे और उसके परिवार वालों से उलझते रहते है ।
कभी कभी वह बडे दु:ख से कहता था..
‘रामजी भाई कुछ समझ में नहीं आ रहा है । गत पचास, साठा सालों में इस गांव में जो मेरे या मेरे परिवार वालों के साथ नहीं हुआ अब हो रहा है ।’
‘छोटी छोटी बातों पर अपना मन छोटा क़्यों करते हो भाई हम है ना यह सब तो चलता रहता है’ वह उसे समझाता और उस दिन वह सब कुछ हो गया, आचानक हो गया, या पहले से तयशुदा था इस बारे में वह कुछ भी नहीं जानता था ।
और अल्‍लाबख्‍श को गांव छोडकर जाना पडा । अब गांव में केवल उसकी यादें और उसके घर के खंडहर की निशानियां शेष है। उसका टूटा हुआ घर, जली हुई मस्जिद जिसमे हनुमन जी की मूर्तिया रखी हुई है । खेत जिस पर पता नहीं कितने लेगो का कब्जा है ।
जिन्ड़ोंने उसके साथ यह सब कुछ किया वे शायद उसे भूल गए हो परंतु वह उसे किस तरह भूल सकता है ।
उसे बार बार अनुभव होता था जैसे अल्‍लाबख्‍श उसकी नस नस में बसा हुआ है । उसे उसकी एक एक बात याद आती है । उसके साथ गुजारा एक एक शण याद आता है । उसे हर जगह उसकी कमी अनुभव होती है ।
पता नहीं उन लेगों को भी अल्‍लाबख्‍श की कमी अनुभव होती भी है या नही । जिन्ड़ोंने उसे गांव छोडने पर विवश किया था ।
उसे गांव छोडने के लिए विवश करके पता नहीं उनकी किस भावना की तुळाी हुई है ।
वह रोजाना जब जागता है तो उसके कान अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज सुनने के लिए व्याकुल रहते है । उसे पता था उन्‍हे उसकी आज़ान की आवाज सुनाई नहीं देगी । क़्योंकि अब अल्‍लाबख्‍श या कोई मियां बश अब इस गांव में नही रहता है फिर भी उसके कान आज़ान की आवाज सुनना चाहते है ।
उसे उसकी आज़ान की आवाज सुनकर एक मनासिक शान्ति मिलती थी ।
परंतु अब जब वह आवाज सुनाई नहीं देती है तो उसे दिनभर एक बेचैनी सी अनुभव होती है ।
जब उसकी व्याकुलता हद से बढ जाती है तो वह टेप रेकार्ड के पास जाता है और उसमें वह कॅसेट लगता है जिसमें उसने अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज टेप की थी । और पूरे वालयूम में जब वह अल्‍लाबख्‍श की आज़ान सुनता है तो उसके मन को बडी शान्ति मिलती है ।
हैया ललपकलह.... हैया ललपकलह....
भालई की और दौडो... भालई की और दौड.... द द
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Hindi Short Story Atank Ka Ek Din By M.Mubin

कहानी आतंक का एक दिन लेखक एम. मुबीन

जब वह घर से निकल तो सबुकछ नित्य के समन चल रहा था ।
बिल्डिंग का वाचमौन उसे देखकर खहा हो गया और उसने उसे सलाम किया । उसने सिर के संकेत से उसके सलाम का जवाब दिया । आगे बढ़ तो एस.टी.डी. बूथ में बैठे साजिद ने उसे सलाम किया । उस दिन उसके झेरॉक़्स, पी.सी.ओ में कुछ ज्‍यादा ही भीड थी और करने वालों की भी लईन लगी हुई थी ।
क़्लासिक आईल डेपो मे बैठे गुड्डो ने भी उसे सलाम किया उसके सलाम का जवाब देता वह सीढियों से नीचे उतरा ।
सामने आलू प्याज बेचनेवाले दुकानदारों की पारिचित शक़्लों और चेहरे दिखाई दिए ! वही रिक्‍शा, हाथगाडी, मेटर साईकल और स्‍कूटरों की रेल पेल और उनके हार्न का शोर ।
उनके बीचसे रास्ता बनाता वह बडी कफ़्न
ईसे आगे बढा ।
बिस्मिलल चिकन सेंटर पर चिकन खरीदने वालों की कतार लगी
थी । एक तख्‍ती पर आज का मूल्‍य लिखा था लटकती, तख्‍ती हवा के साथ गोल गोल घूम रही थी ।
उसके सामने वाली दुकान पर मूल्‍य एक रूपया कम था । सदगुरू होटल के बाहर मिठाई बनाने वाल प्याज़ के पकोडे तल रहा था । बडी सी थाल में वह जलेबियां, वडे और आलू के पकौडे पहले ही तल चुका था ।
गुलजार कोलड्राींक मे एक़्का दुक़्का ग्राहक बैठे शीतपेय का आनंद ले रहे थे ।
बर्फ की गाडी आ गई थी । बर्फ की बडी बडी लदियां उसमें से उतारी जा रही थी । बर्फ लेने वालों की भीड थी । जैसे ही कोई ग्राहक बर्फ की कीमत आदा करता दो आदमी बडी लोहे की कैची मे बर्फ की लदी पकडकर उसे रिक्‍शा में रख आते । मामू आबुजी की दुकान पर दूध लेने वालों की भीड थी । उसके सिरपर दूध के मूल्‍य की तख्‍ती हवा मे घूम रही थी ।
‘तीन रूपया पाव - दस रूपये का एक किले..’ ‘तीन रूपया पाव - दस रूपये का एक किले..’
टमटर बेचने वाले जोजोसे आवाज़ेंलगा रहे थे ।
‘भाई आस्सलम वाले कुम’ आवाज लगाते हुए आनवर और शकील ने नित्य के समन उसे सलाम किया ।
सलाम का जवाब देकर स्वयं को भीह के धक़्कों और नीचे फैले कीचह से बचाता वह आगे बढा । रिक्‍शा कतार में खडे आजीज ने मुस्काकर उसे सलाम किया ।
पुलिस स्टेशन के बाहर कई सिपाही खडे थे और एक सिपाही उन्‍हे उनकी डयूटी का एरिया बता रहा था ।
‘नमस्कार साहब’ एक सिपाही ने उसे सलाम किया ।
‘अरे पोतदार तुम... चले...!’ उसने उससे कहा ।
‘नहीं आज मेरी डयूटी नहीं है, आज शायद कोई दूसरी सिपाही आए....’ सिपाही ने उत्तर दिया ।
मिर्चवालों की दुकान के पास से गुजरते हुए उसे खांसी आ गई ।
उसने खांसी पर नियंत्रण पाया और आगे बढा । संगम ज्वेलर्स की दुकान भी खुल गई थी । राजदीप होटल के काउंटर पर बैठे संदीपने उसे नमस्कार किया और बाहर पूरी भाजी बनाने वाले आदमी को गाली देते हुए उसे जल्‍द आर्डर का मल बनाने के लिए कहने लगा ।
सिनेम की गली से होता वह पोस्ट आफिस तक आया। पोस्ट आफिस के बाहर, मनी आर्डर, रजिस्टर करने वालों की भीड थी ।
सईदी होटल के बाहर दो चार आवारा लडके बैठे आने जाने वालों को छेड रहे थे और आने जाने वाली लडकियों और स्रियों पर भाद्दे शब्द उछल
रहे थे । उन सबसे होता वह समय पर आफिस पहुंच गया । और आफिस के कामें मे लग गया ।
आफिस में उस दिन ज्यादा भीड थी काम का बोझ भी आधिक था ।
एक एक को निपटाते हुए कब दो तीन घंटे बीत गए पता ही नहीं चल सका ।
आचानक उसके एक साथी मोहन को उसके भाई का पकोन आया । पकोन पर बात करने के बाद जब उसे रिसीवर रखा तो उसके चेहरे पर हवाईयां उह रही थीं ।
‘क़्या बात है ?’ उसने मोहन से पूछा
‘‘भाई का पकोन था.. नाके पर किसी वकील को गोली मर दी गई है वह जगह पर ही मर गया - शहर मे भागदड मच गई है... दुकाने बंद हो रही है.. गडबड होने की शंका है । मेरे भाई ने कहा है कि मैं आफिस से आ जाऊं ।’’
यह बात सुनकर उसके मथे पर बल पड गए । उसने प्रश्नपूर्ण द़ष्टि से बॉस की और देखा ।
‘मैं पकोन लगाकर पूरी जानकारी का पता लगाता हूं ।’ कहते हुए बॉस ने रिसीवर उफ़्या दो तीन नंबर डायल करके झललकर रिसीवर रख दिया ।
‘‘टेलीपकोन डेड हो गया है ...’’
थोडी देर बाद चपरासी भी वापस आ गया । वह किसी काम से बाहर गया था ।
‘क़्या हुआ जाधव ?’ उसने पूछा
‘कुछ समझ में नहीं आ रहा है - पूरे शहर में भागदड नची हुई है । किसी वकील को गोली मर दी गई है । दुकाने बंद हो रही है... लेग घबराहट में उधर उधर भाग रहे है... पता चल है कि रिक्‍शा और गाडियों पर पथराव किया जा रहा है... मेरी आखों के सामने चार-पांच कांच फूटी रिक्‍शा आई है ... सबसे ज्यादा लपकडा नजराना के पास है...’
‘नजराना’ ! यह सुनते ही बॉस के चेहरे पर हवाईयां उडने लगी । ‘‘मेरी बेटी इस समय वहां पर टयूशन के लिए गई होगी ।’’
और वह घबराकर रिसीवर उफ़्कर फिर नंबर डायल करने लगा ।
संयोग से टेलीपकोन लग गया ।
‘‘मीना कहा है ? टयूशन के लिए गई है ? टयूशन का समय तो खत्म हो गया है... वह अभी तक वापस क़्यों नही आई ? सुना है उस क्षेत्र में बहुत गडबड चल रही है । तुरंत किसी को भेजकर उसे टयूशन क़्लास से ले आओ..’’ कहते उसने टेलीपकोन का रिसीवर रख दिया ।
परंतु उसके चेहरे पर चिंता के भाव थे । उसके बाद उसने घर टेलीपकोन लगाकर स्थिती का पता लगाने का प्रयत्न किया तब तक टेलीपकोन डेड हो गया था ।
आफिस से बाहर झांका तो सारी दुकानें बंद हो गई थीं । सडके सुनसान हो गई थीं । सडकों पर कोई वाहन, सवारी, दिखाई नहीं दे रही थीं । लेग दो-दो चार-चार की टोलियां बनाकर आपसमें बातें कर रहे थे ।
‘‘क़्या किया जाए ?’’ उसने बॉस से पूछा ।
‘‘आफिस बंद कर दिया जाए?’’
‘‘बिलकुल बंद कर दिया जाए । जलदी से बाकी बचे काम निपटा ले’’ बॉस ने कहा और फिर घर टेलीपकोन लगाने का प्रयत्न करने लगा ।
‘जाधव सामने के नसीम से मेबाईल ले आओ शायद उससे कोई संपर्क हो जाए’ बॉस ने चपरासीसे कहा ।
जाधव ने मेबाईल नहीं लया स्वयं नसीम मेबाईल लेकर आ गया ।
‘‘साहब सारे टेलीपकोन डेड हो गए है.. मैं भी कई स्थानों पर पकोन लगाने का प्रयत्न कर रहा हूं । आपको कौन सा नंबर लगाना है?’’
बॉस ने नंबर बताया नसीम ने नंबर लगाने की कोशिश की परंतु नंबर नहीं लग सका ।
‘लगता है सारे शहर के टेलीपकोन बंद कर दिए गए है ।’
सब काम समप्त करने में लग गए । उसने दो तीन बार घर टेलीपकोन लगाने का दोबारा प्रयत्न किया । संयोग से एक बार टेलीपकोन लग गया ।
‘क़्या स्थिति है ?’ उसने पूछा
‘‘यहां बहुत गडबड है सारी दुकानें बंद हो गई है । सड़क की दोनों ओर हजारों लेगों की भीड है जो एक दूसरे के विरोध में नारे लगा रहे है । मामला कभी भी बिगह सकता है ।’’
‘‘मैं घर आऊं ?’’ उसने पूछा ।
‘‘घर आने की मूर्खता मत करना सारे रास्ते बंद है । रास्तों पर लेगों की भीड है और जोश और क्रोधमें भारी भीड कभी भी कुछ भी कर सकती है । आप जहा है वहीं रहें । जब परिस्थिती सामन्य हो जाए तो घर आ जाना वरना आने की कोई जरूरत नहीं । आफिस के आसपास आपके बहुत से मित्र है । किसी के भी घर रूक जाईए और मुझसे संपर्क बनाए राखिए ’’ पत्‍नी ने उत्तर दिया ।
उसने रिसीवर रख दिया ।
आफिस बंद करने की तैयारी हो गई थी ।
मेहन का भाई स्‍कूटर लेकर आ गया ।
‘‘चले मैं चलता हूं’’ मेहन बोल ।
‘‘सूनो’’ उसने मेहन को टोका ‘‘पुराने पुल के रास्ते नहीं जाना... वहां खतरा है ।’’
‘‘नहीं मैं नए पुल के रास्ते जाऊंगा’’ मेहन बोल साहब और जाधव भी आफिस बंद करके जाने की तैयारी कर रहे थे । उनके घर आफिस के समीप थे ।
‘‘तुम क़्या करोगे ?’’ बॉस ने पूछा ।
‘‘पत्‍नी को पकोन किया था वह कहती है मैं घर आने की मुर्खता ना करूं । सारे रास्ते भीड से भारे है... लेगों के हाथों में हाथियार है। पथराव हो रहा है । रास्ते में कुछ भी हो सकता है । मैं जिन रास्तों से होकर घर जाता हूं वहां तो बहुत ज्यादा तनाव है । फिर उन रास्तों का हर व्‍यक्ति मुझे पहचानता है । जरा सी गडबडकी स्थिति में मेरी जान को खतरा पैदा हो सकता है ... ।’’
‘‘तो मेरे घर चले । परिस्थिति सामन्य हो जाए तो अपने घर चले जाना ।’’ बॉस ने कहा ।
‘‘नहीं मैं यहां रूकता हूं यदि जरूरत पडी तो आपके घर आ जाऊंगा।’’
आफिस बंद कर दिया गया ।
बास और जाधव चले गए ।
वह आफिस के सामने खडा होकर सुस्ताने लगा ।
उसी समय सामने से मुस्‍तफा आता दिखाई दिया ।
‘मुस्‍तफा क़्या बात है ?’ उसने पूछा ।
‘आपसे मिलने ही आ रहा था जावेद भाई । पूरे शहर में गडबड चल रही है आपकाघर जाना ठीक नहीं है । चालिए मेरे घर चालिए । रात में भी मेरे घर रूक जाईए । मैंने भाभी को पकोन किया था । भाभी ने कहा है मैं आपको घर आने ना दूं । अपने घर रोक लूं वहां बहुत गडबड है ।’
वह बातें करता मुस्‍तफा के साथ उसके घर की ओर चल दिया ।
‘गडबड आरंभा किस तरह हुई ?’
‘‘पता नहीं, वह वकील शहर के चौराहे से होता कोर्ट जा रहा था । आचानक दो मेटर साईकल सवारों ने उसे रोककर उसके सिर में गोली मर
दी । वह वहीं ढेर हो गया । होगी कोई पुरानी दुश्मनी या गेंगवार का चक़्कर... वैसे भी वह वकील कापकी काले कामें में शामिल था और कापकी बदनाम था । परंतु एक राजनैतिक पक्ष के केस भी लडता था । इसलिए उस पक्ष ने पहले राजनैतिक और फिर सांप्रदायिक रंग दे दिया ।
दुकाने बंद कराई जाने लगीं । दुकाने बंद ना करने वाले दुकानदारों को मरा पीटा जाने लगा । रिक्‍शा की कांचे पकोडी गई, रिक्‍शा उलटी कर आग लगा दि गई । विशेष रूप से दाढी वाले रिक्‍शा ड्राईवरों को निशाना बनाया जाता ।’’ क्रोधसे उसने अपने होठ भींचे ।
‘‘यह भी कोई तरीका है सामन्य सी बात है । निजी दुश्मनी या किसी और कारण से एक साधारण व्‍यक्ति की हत्या हुई होगी उसे तुरंत राजनैतिक और सांप्रदायाकि रंग देकर शहर की शान्ति भंग की जाए और नागारिकों की जान व मल से खेल जाए ...’’
दोपहर का भोजन उसने मुस्‍तफा के घर किया ।
एक दो बार उसने घर पकोन लगाने का प्रयत्न भी किया परंतु पकोन बंद होने के कारण संपर्क स्थापित नहीं हो सका ।
एक घंटे के बाद आचानक संपर्क स्थापित हो गया ।
‘‘यहां बहुत गडबड है । पत्‍नी बताने लगी ।’’ ‘‘हम बिल्डिंग की टेरिस पर गए थे । आसपास हजारों लेग जम है । वे आक्रमण करने की तैयारी कर रहे है । सामने वाली मस्जिद पर पथराव हो रहा है । इस्लामी होटल पर पथराव किया गया था और उसे लूटने और जलने की कोशिश की गई थी । परंतु होटल की गली में हजारों लडके जम हो गए थे उन्‍हों उत्तर में पथराव किया तो आक्रमणकारी भाग गए परंतु दोनों ओर से भाडकीली नारे बाजी जारी है । स्थिती कभी भी बिगड सकती है । आप इस ओर आने की बिलकुल मुर्खता ना करे । मुस्‍तफा के घर ही रूक जाए ...’’
‘देखो यदि तुम्‍हें बिल्डिंग पर खतरा अनुभव हो तो बच्चों को लेकर अपने मयके चली जाना ।’
‘यूं तो बिल्डिंग को खतरा नहीं है । परंतु जिस प्रकार सामने हजारों लेगों की भीड जम हो रही है कभी भी कुछ भी हो सकता है, ऐसा कुछ हो इससे पहले ही मैं अपने बच्चों के साथ मयके चली जाऊंगी ।’ पत्‍नी बोली ।
पत्‍नी का मयका ज्यादा दूर नहीं था । घर सुरक्षित रास्तों पर था । इसलिए उसे इस बात का संतोष था । पत्‍नी समय आने पर आराम से बच्चों को लेकर मयके चली जाएंगी जो कापकी सुरक्षित है। परंतु अपने घर का क़्या ?
कुछ गडबड हुई तो उसे लूटने और जलने से कौन बचा सकता है ?
उन्‍हे वह मकान लिए आठा महीने भी नहीं हुए थे । सारी जीवन की कमई, बँक से कर्ज, जेवरात बेचने के बाद उन्‍हों वह मकान लिया था और धीरे धीरे उसमें जरूरत की हर चीज सजाई थी। यदि वह घर लूट लिया गया ! या जल दिया गया तो ?
उसका दिल तेजी से धडकने लगा और मथे पर पसीने की बूंदे उभर आईं...
मुस्‍तफा ने टी.वी. चालू किया ।
टी.वी. के हर चैनल से शहर में होनेवाले हंगामें की खबरें आ रही थी।
‘‘शहर में एक वकील की हत्या के बाद एक राजनैतिक पक्ष के कार्यकर्ताओं का हंगाम, पथराव,तोडपकोड....’0ं खबरों में पहले उस वकील का संबंध उस पक्ष से इस हद तक बताया गया कि वह उस पक्ष के लिए केस लडता था ।
फिर समचार में उस वकील को उस पक्ष का कार्यकर्ता बताया जाने लगा ।
और आंत में उसे उस राजनैतिक पक्ष का अध्‍यक्ष बना दिया गया ।
‘‘एक राजनैतिक पार्टी के अध्‍यक्ष एक वकील की हत्या के बाद शहर में सख्त तनाव, पथराव की घटनाएं, दुकानें लूटने और छुरे बाजी की वारदाते... आमेल काटेकर नामक एक व्‍यक्ति को मार मार के लेगों ने आधमरा कर दिया... श्री प्रोवीजन नामक दुकान को आग लगा दी गई । महादेव मेडिकल लूट ली गई।’’
जैसे समचार हर चैनल देने लगा और उसे सुन सुनकर तनाव और हिंसा बढने लगी । स्थिती गंभीर होती जा रही थी । उसका मन डूब रहा था ।
उसे लगा शहर बारूद का ढेर बन चुका है और अब वह फटा
चाहता है ।
आंखो के सामने गुजरात के दंगो के चित्र और समचार नाच रहे थे ।
लेगों को जिंदा जलया जाना... चुन चुनकर लेगों को मरना... उनकी संपती भंग करना, उनके घरों, पूजा स्थले को मंदिरों में पारिवार्तित करना।
उसका मन डूबने लगा और आखों के सामने आंधकार सा छाने लगा क़्या हमरा यही भाग्य बन गया है ?
बाहर लेगों की भीड टोलियों के रूप में जगह जगह जम हो रही थी । हर कोई प्लान बना रहा था । यदि दंगा आरंभा हो तो क़्या किया जाए कुछ बचाव की तरकीबें सोच रहे थे तो कुछ लूटमर का प्लान बना रहे थे । तो कुछ प्रातिकात्मक आक्रमण के लिए रणानिती तय कर रहे थे ।
जो लेग उस स्थान को असुरक्षित अनुभव कर रहे थे उस स्थान को छोडकर सुरक्षित स्थानों पर जा रहे थे ।
कुछ स्थानों पर पुलिस का नाम व निशान भी नहीं था तो कुछ स्थानों को पुलिस छावनी बना दिया गया था । ऐसा कुछ लेगों की सुरक्षा के लिए किया गया था । तो कुछ क्षेत्र के लेगो को आजाद छोड दिया गया था । वे जो चाहे कर सकते है उनको रोकने वाल कोई नहीं है । तो कुछ क़ोत्रों को इस प्रकार सील कर दिया गया था कि वहां पंछी भी पर नहीं मर सकता था । और वह कुछ नहीं कर सकते था । शहर से नापसंद घटनाओं के समचार निरंतर आ रहे थे।
हर समचार के बाद ऐसा अनुभव होता था स्थिति गंभीर से गंभीर होती जा रही है । तनाव और हिंसा जारी है ।
उसने कई बार घर पकोन लगाने का प्रयत्न किया परंतु संपर्क स्थापित नहीं हो सका । जिसके कारण उसकी चिंता बढती जा रही थी । पत्‍नी घर में अकेली है उसे मयके जाने के लिए कहा था । पता नहीं वह मयके गई भी है या नहीं ?
उसे मयके चले जाना चाहिए । परंतु वह मयके नहीं जाएगी। घर में जो जान अटकी है ।
इतनी कठनाईयों से उन्‍हों अपना घर बनाया है । घर की एक एक चीज में अपना खून पसीना लगाया है । घरकी हर ईंट में उनके आरमन सपने चुने हुए है । भाल वह उस घर को छोडकर किस तरह जा सकती है ?
उसे भाय है - उसके यह सारे अरमान से सपने जलकर राख ना कर दिए जाए । यदि वह ऐसा सोच रही है तो यह उसकी मूर्खता है यदि वह घर में रही तो ना घर बचा सकेगी और ना अपने आप और बच्चों क बचा सकेगी ।
एक निर्बल स्‍त्री भाल अपने आपको किस तरह बचा सकती है? हजारों घटनाएं उसके मस्तिष्‍क में चकरा रही थीं । ऐसी स्रियों को वासना का शिकार बनाकर जिंदा जल दिया गया । बच्चों को संगीनों और त्रिशूलों से छेदकर जल दिया गया ।
‘नहीं’ उसके होठोंं से एक चीख निकल गई ।
‘क़्या हुआ ?’ मुस्‍तफा ने चौंककर पूछा ।
‘कुछ नहीं एक भायानक सपना देख रहा था’ ।
‘जागते हुए’ मुस्‍तफा ने मुस्कराकर पूछा ।
‘जो कुछ हो रहा है वह एक भायानक सपने से भी घिनावना है । ऐसी स्थिती में जागना और सोना सब बराबर है..’ उसने कहा
मुस्‍तफा उसकी बात समझ नहीं सका ।
शामको उसने तय किया वह थोडी दूर तक स्थिती का निरशण करके आएगा । मुस्‍तफा ने उसे ऐसा करने से रोका । वह घर जाने की मुर्खता ना करें।
उसने मुस्‍तफा को विश्वास दिलया वह घर जाने का प्रयत्न नहीं करेगा। थोडी दूर गया तो उसे एक पारिचित मिल गया ।
‘जावेद भाई आप घर जाने का प्रयत्न ना करें.. इसमें बहुत
खतरा है । आपकाघर जिन रास्तों पर है वे खतरों से भारे है । अच्‍छा यही है आप रात में यहां रूक जाए । वैसे स्थिति सामन्य हो गई है। परंतु कब क़्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता...’
‘नहीं मैं घर नहीं जा रहा हूं बस यूंही थोडी दूर तक टहलकर वापस आ जाऊंगा’ उसने उत्तर दिया ।
‘वैसे आप सुरक्षित रास्तों से घर जाना चाहे तो घर जा सकते है । उन रास्तों पर कोई खतरा नहीं है । मैं आपको घर छोड देता हूं ...।’
उसने उसे मेटर साईकल पर बिफ़्या और सुरक्षित रास्तों से होते वे आगे बढे ।
उन रास्तों मेहललों से गुजरते उन्‍हे अनुभव हो रहा था जैसे वहां पर बहुत कुछ हुआ है ।
हर जगह भीड जम हुई थी । राजनेता और वॄद्ध, बुजुर्ग लेग भीड को अपनी अपनी तौर पर समझाने का प्रयत्न कर रहे थे । और भीड को कुछ अनुचित करने से रोक रहे थे ।
क्रोधऔर उत्साह में भारे नवयुवक उनसे तरह तरह के प्रश्न पूछ रहगे थे और अपने पर बार बार होने वाले आन्यायों का हिसाब मंग रहे थे ।
घर के समीप पहुंचा तो पीछे वाली गली में हजारों लेगों की भीड जम हुई थी ।
जिन्ड़े दो लीडर समझाकर स्वयं पर नियंत्रण रखने और धैर्य से काम लेने के लिए कह रहे थे ।
घर आया तो उस पर पत्‍नी भाडक उठी
‘इतना समझाने पर भी आप नहीं मने । आपको समझायाथा ना आप घर ना आएं? अपनी जान खतरे में डालकर चले आए । यदि कुछ अनुचित हो जाता तो ..?’
‘नहीं ऐसी बात नहीं है मैं स्वयं को पूरी तरह सुरक्षित अनुभव करने के बाद ही यहां आया हूं एक पारिचित मिल गया था उसने मेटर साइकिल पर यहां तक लकर छोडा...’
रात तक स्थिती सामन्य हो गई थी । यह तय था रात आतंक और तनाव में गुजरेगी ।
परंतु आतंक का एक दिन तो बीत गया था । द द
अप्रकाशित
मौलिक
------------------------समाप्‍त--------------------------------पता
एम मुबीन
303 क्‍लासिक प्‍लाजा़, तीन बत्‍ती
भिवंडी 421 302
जि ठाणे महा
मोबाईल 09322338918
Email:- mmubin123@gmail.com

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